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डाउनलोड करेंशालिनी जोशी
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
नन्हा सा पहाड़ी राज्य उत्तराखंड मुख्यमंत्री बदलने की प्रयोगशाला बन चुका है. यहां सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री ऐसे बदले जा रहे हैं जैसे क्रिकेट के मैच में गेंद.
शायद ये देश का अकेला राज्य होगा जिसने अपने 13 साल के जीवन में सात मुख्यमंत्री देखे हैं और अब उस पर आठवां मुख्यमंत्री थोपा जाने की चर्चा है. मुख्यमंत्री बदलने के इस खेल में अब तक बीजेपी ही माहिर थी लेकिन अब सत्ताधारी कांग्रेस भी पीछे नहीं दिख रही है.
(उत्तराखंड मक्का बन सकता हैः मोदी)
बताया जाता है कि मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की विदाई तय हो गई है और पार्टी के आलाकमान ने उन्हें इसकी सूचना दे दी है. अगले दो दिनों में पार्टी नेता गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी और जनार्दन द्विवेदी केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर देहरादून आने वाले हैं. विधायकों से विचार विमर्श के बाद वे अगले मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लगाएंगे.
नए मुख्यमंत्री के लिए हरीश रावत, इंदिरा हृदयेश और प्रीतम सिंह के नामों की चर्चा है. जाहिर है लोकसभा चुनावों को देखते हुए हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जाएगा और अंतिम फैसले में जाति और महिला-पुरुष के फ़ैक्टर भी निर्णायक होंगे.
एक दिलचस्प बात ये भी है कि पिछले महीने इंदिरा हृदयेश ये कहते हुए दिल्ली गई थीं कि वह उत्तराखंड की मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं लेकिन तब बहुगुणा ने हाज़िरजवाब दिया था, \"मेरी \'कुर्सी\' खाली नहीं है.\"
प्राकृतिक आपदालेकिन अब जब उन्हें कुर्सी खाली करने के लिए कह ही दिया गया है और ये पूछा जा रहा है कि वे कौन से कारण हैं जिनसे विजय बहुगुणा को कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा? सवाल ये भी है कि ऐन लोकसभा चुनाव के पहले मुख्यमंत्री बदलकर क्या कांग्रेस मैदान मार लेगी?
(रामदेव के खिलाफ मामले दर्ज)
दो साल पहले विधानसभा चुनाव के बाद, जब मुख्यमंत्री की रेस में आगे चल रहे हरीश रावत और हरक सिंह रावत को दरकिनार कर विजय बहुगुणा को सत्ता की बागडोर सौंपी गई थी तब से ही उनकी छवि \'पैराशूट मुख्यमंत्री\' की रही है. विरोधी खेमे के विधायक और मंत्री उनके खिलाफ गोलबंदी ही करते देखे जाते रहे हैं.
ऐसी ही कोशिश उत्तराखंड के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के पांच साल के कार्यकाल में भी होती रही थी लेकिन उन्हें सबको खुश रखने की कला में महारत हासिल थी. हांलाकि बहुगुणा ने भी इसमें कोई कसर नहीं रखी और यहां तक कि हाल ही में उन्होंने विधायकों के वेतन और भत्ते भी दोगुने-तिगुने कर दिए.
सरकार की छवि चमकाने के लिए प्रचार अभियान में भी दोनों हाथों से सरकारी कोष खर्च किया. इसके बावजूद जून में आई प्रलयंकारी आपदा में राहत और बचाव में कथित लापरवाही और राहत राशि के कथित दुरुपयोग से उन पर ये गाज गिरी है.
लोकसभा चुनावप्रदेश कांग्रेस में उनके ख़िलाफ़ असंतोष की लहर है और सूत्रों के अनुसार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कथित रूप से कर्मठ चेहरे के साथ जाना चाहती है जो जिताऊ साबित हो. राज्य में लोकसभा की पाँच सीटें हैं और आने वाले चुनाव में एक-एक सीट बहुत मायने रखेगी.
(केदारनाथ में राहत नहीं...)
बार-बार मुख्यमंत्री बदलने का ही खामियाजा है कि सत्ताधारी कांग्रेस और बीजेपी दोनों में इस समय कम से कम तीन सक्रिय खेमे हैं जो लगातार एक दूसरे के लिए गड्ढा खोदते रहते हैं. कांग्रेस में हरीश रावत, इंदिरा ह्रदयेश, हरक सिंह रावत हैं तो बीजेपी में रमेश पोखरियाल निशंक, भुवन चंद्र खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी हैं.
इस राजनीतिक अस्थिरता का उत्तराखंड के विकास पर कितना प्रतिकूल असर पड़ रहा है, ये भी एक अध्ययन का विषय है. अंत में सवाल ये भी है कि अगर मुख्यमंत्री बदलने के बावजूद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का अपेक्षित प्रदर्शन नहीं रहता है तो क्या मुख्यमंत्री फिर बदल दिया जाएगा?
तीन साल बाद जब प्रदेश विधानसभा चुनाव होंगे तो क्या कांग्रेस किसी और चेहरे को आजमाएगी. बीजेपी की पिछली सरकार में पहले खंडूड़ी, फिर निशंक और फिर खंडूड़ी का खेल हो चुका है. कांग्रेस भी उसका अनुसरण करती नजर आ रही है.
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