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हम अमेरिकी नीति के असली चरित्र को समझें- वेदप्रताप वैदिक

वॉशिंगटन में 6 जुलाई को भारत के विदेश व रक्षा मंत्रियों के साथ होने वाली बैठक का स्थगित होना।

Dainik Bhaskar

Jun 30, 2018, 12:28 AM IST
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डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनते ही भारत में यह समझा जाने लगा था कि भारत-अमेरिका संबंध इतने गहरे हो जाएंगे कि वे ‘स्वाभाविक मित्र’ के मुहावरे को चरितार्थ कर देंगे। ट्रम्प ने आतंकवाद के खिलाफ जैसा युद्ध छेड़ा था, उससे लगा था कि एशिया में भारत उसका सबसे घनिष्ट मित्र बन जाएगा। क्लिंटन और ओबामा से भी ज्यादा ट्रम्प भारत का समर्थन करेंगे लेकिन, ट्रम्प ने अपनी उठा-पटक नीतियों का ऐसा जाल फैलाया है कि भारत के नीति-निर्माता भी बार-बार असमंजस में पड़ जाते हैं। अब ताज़ा खबर यह है कि वॉशिंगटन में 6 जुलाई को होने वाली भारत-अमेरिकी बैठक स्थगित कर दी गई हैं। भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन अमेरिका के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री से सघन भेंट करने वाली थीं। इस भेंट के दौरान दोनों देशों के बीच कुछ ऐसी बुनियादी समझ बननी थी, जिसके कारण अमेरिका की एशिया नीति में ऐतिहासिक परिवर्तन हो सकते थे और विश्व राजनीति में भारत का जो स्थान होना चाहिए, उसका रास्ता तैयार हो जाता लेकिन, बैठकें टली हैं तो इसके कुछ ठोस कारण हैं।
यूं तो अमेरिकी प्रवक्ता ने सफाई दी है कि बैठक टालने के पीछे भारत को नीचा दिखाने की इच्छा नहीं है। पिछले साल ट्रम्प-मोदी भेंट के दौरान इन बैठकों की योजना बनी थी लेकिन, अभी तक इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा है। इसका एक तात्कालिक कारण यह हो सकता है कि ट्रम्प प्रशासन ने भारत से अमेरिका को निर्यात की जानेवाली चीजों पर अनाप-शनाप ड्यूटी लगा दी है तो भारत ने भी अमेरिका से आयात होने वाली 29 चीजों पर ड्यूटी ठोक दी है। अमेरिका ने भारत के माल पर जो ड्यूटी लगाई, उससे भारत का 1600 करोड़ रुपए का निर्यात प्रभावित होता है। इस मुद्‌दे पर आजकल दोनों देशों के प्रतिनिधि काफी खींचा-तानी में उलझे हुए हैं।
दूसरा मुद्‌दा, जिसने भारत और अमेरिका के बीच तनाव पैदा कर दिया है, वह है- ईरान पर प्रतिबंधों का। अमेरिका ने ईरान के साथ हुए परमाणु-सौदे का बहिष्कार कर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं। उसने यह घोषणा भी कर दी है कि जो भी देश ईरान से व्यापारिक संबंध रखेगा, अमेरिका उसके विरुद्ध भी कार्रवाई करेगा। ट्रम्प की इस घोषणा से भारत की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि भारत ईरान से लगभग पौने दो सौ टन तेल आयात करता है। ईरानी तेल भारत को सस्ता भी पड़ता है। ओबामा काल में अमेरिका ने भारत की परेशानी को ठीक से समझकर बीच का रास्ता निकाल लेने दिया था। तुर्की बैंकों के जरिये भारत ईरान को भुगतान कर देता था लेकिन, इस बार भारत पसोपेश में है कि पता नहीं ट्रम्प -प्रशासन का रवैया क्या हो। वैसे भारत ने तेल मंगाने के वैकल्पिक रास्तों को खंगालना शुरू कर दिया है।
दूसरे शब्दों में अमेरिका द्वारा लगाए प्रतिबंधों को मानने की कोशिश भारत जरूर कर रहा है लेकिन, भारत-ईरान संबंधों की घनिष्टता को देखते हुए ट्रम्प -प्रशासन में कुछ बेचैनी होना स्वाभाविक है। इस बेचैनी को बढ़ाने में चाबहार बंदरगाह का भी बड़ा हाथ है। इस सामरिक महत्व के बंदरगाह को तैयार करने का जिम्मा भारत ने ले रखा है। 2019 तक यह तैयार हो जाएगा। भारत इस पर 4 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहा है। इस बंदरगाह को रेलमार्ग द्वारा अफगानिस्तान से भी जोड़ दिया जाएगा। मध्य एशिया के पांचों मुस्लिम गणतंत्रों से भारत का सीधा संबंध बन जाएगा। फारस की खाड़ी के जरिये वह अपने व्यापारिक और सामरिक संबंध अरब देशों से भी बढ़ा सकेगा। अमेरिका की खातिर भारत अपनी इस महत्वाकांक्षी योजना का परित्याग क्यों करे ?
जाहिर है कि सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमन वॉशिंगटन जातीं तो इन सब मुद्‌दों पर खुलकर बात होती और भारत के रवैए का सामना करना अमेरिका के लिए आसान नहीं होता। यही मौका है, जबकि ट्रम्प-नीति के असली चरित्र को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
ट्रम्प ने यह घोषणा बहुत साफ-साफ शब्दों में कर रखी है कि वे अमेरिका और सिर्फ अमेरिका के हितों के संरक्षक हैं। ‘पहले अमेरिका’, यही उनकी नीति है। इसका मतलब साफ है। ट्रम्प के लिए कोई सिद्धांत, कोई नीति, कोई देश, कोई मित्र, कोई संगठन, कोई परम्परा पवित्र नहीं है। वे जो समझें, वही अमेरिकी राष्ट्रहित है और उसके लिए वे किसी भी चीज की कुर्बानी कर सकते हैं। भारत को भी वे इस नज़रिये से देखते हैं। उन्होंने पिछले साल से पाकिस्तान को धमकाना शुरू किया। उसकी सैन्य सहायता बंद कर दी। उसे आतंकवाद के विरुद्ध कमर कसने के लिए बार-बार ललकारा और इधर भारत को खुश करने के लिए एक नई अवधारणा का सिक्का उछाला। उसे नाम दिया गया-- इंडो-पेसिफिक। यानी भारत-प्रशांत क्षेत्र। इसका अर्थ यह हुआ कि पूरे एशियाई-प्रशांत क्षेत्र का नेता वह भारत को मानता है लेकिन, व्यापार के मामले में उसने भारत के साथ वही किया, जो उसने चीन के साथ किया। ईरान के प्रति उसकी दादागिरी का भारत ने स्पष्ट शब्दों में विरोध नहीं किया। वह तटस्थ रहा लेकिन, अमेरिका को भारत के हितों की चिंता बिल्कुल नहीं है।
यदि ट्रम्प-प्रशासन को भारत के हितों की चिंता होती तो वह ईरान के मामले में भारत को छूट तो देता ही, कुछ और भी कर दिखाता। वह पाकिस्तान को जो धमका रहा है, उसके पीछे भारत का हित बिल्कुल भी नहीं है। यदि होता तो वह भारत-विरोधी आतंकवादियों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान को बाध्य कर देता। उसे भारत से ज्यादा चिंता अफगानिस्तान की है। अफगानिस्तान में वह अपने सैनिकों की रक्षा करना चाहता है और खरबों डाॅलर से खरीदे गए प्रभाव को कायम रखना चाहता है। उसने तहरीके-तालिबान के सरगना फजलुल्लाह को तो ड्रोन हमले में मार गिराया लेकिन, भारत-विरोधी लश्कर-ए-तय्यबा आदि के सरगनाओं को वह छूता भी नहीं है। उसने अफगानिस्तान में पिछले डेढ़ साल में डेढ़ सौ ड्रोन हमले किए हैं, जबकि पाकिस्तान में मुश्किल से आधा दर्जन हमले! कश्मीर के सवाल पर वह पाकिस्तान को जरा-भी नहीं दबाता। हां, भारत को अपने हजारों करोड़ के शस्त्र-अस्त्र बेचने के लिए ट्रम्प मीठी बोली बोलने में कोई कसर नहीं छोड़ते। अमेरिका के इस पैंतरे को हमारा विदेश मंत्रालय शायद समझ गया है। इसीलिए अब हमारे प्रधानमंत्री ने चीन और रूस जाकर त्रिकोणात्मक मुद्रा धारण करने की कोशिश की है।
(लेखक के अपने विचार हैं।)

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