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डाउनलोड करेंइंदौर. प्रदेश के जंगलों से वनस्पति (पेड़, पौधे) प्रजातियां तेजी से खत्म हो रही हैं। कुछ लगभग विलुप्त होने की स्थिति में हैं तो कुछ खतरे के निशान पर पहुंच गई हैं। भारतीय राज्य वन अनुसंधान (आईएसएफआर) ने मप्र के विभाग को इस संबंध में चेताया भी है। प्रदेश के जंगलों को हरा-भरा बनाए रखने के लिए कुछ प्रजातियां आगामी वर्षों में लगाने के लिए सुझाव भी दिए हैं।
वहीं विभाग का अनुसंधान व विस्तार केंद्र संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने के लिए प्रदेश की 162 नर्सरी में 50 लाख पौधे तैयार कर रहा है। इन पौधों को इसी वर्ष बारिश के दौरान जंगलों में लगाया जाएगा। आईएसएफआर का कहना है कि संकटग्रस्त प्रजातियाें की पहचान कर ली गई है। इस साल 50 लाख पौधे तैयार होंगे तथा अगले वर्ष एक करोड़ के आसपास का लक्ष्य रखा है।
ऐसे समझें विलुप्ति की कहानी
पचमढ़ी में बरगद की एक प्रजाति फाइकस कुपुलाटा ऐसी है, जो वहीं पैदा हुई और देश-दुनिया के जंगलों में पहुंची। अब स्थिति यह है कि पचमढ़ी में ही इस प्रजाति के तीन पेड़ बचे हैं। अब इस प्रजाति को बचाने के लिए 50 हजार से ज्यादा पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
इन प्रजातियाें पर है अब संकट
अत्यधिक खतरे में- दहीमन, मैदा, शल्यकर्णी, कर्कट।
खतरे में - सोनपाठा, गरुड़ वृक्ष, बीजा, लोध्र
संवेदनशील - कुंभी, गवदी, कंकड़, पाडर, निर्मली, कुल्लू, रोहिना, शीशम
खतरे के नजदीक - धवा, सलाई, चिरौंजी, तमोली, गधा पलाश, धनकट, सलई, हलदू, अंजन, मोखा
कार्ययोजना का पालन नहीं किया
जिस तरह शहरी विकास के लिए मास्टर प्लान के पन्ने पलटना पड़ते हैं, उसी तरह जंगल, वनभूमियों को विकसित करने के लिए कार्ययोजना से काम करना पड़ता है। इंदौर सर्कल में इस हिसाब से काम नहीं हुआ। यह खुलासा तत्कालीन वन संरक्षक बीएस अन्निगेरी ने इंदौर के लिए बनी कार्ययोजना की समीक्षा के दौरान किया था। इंदौर के जंगलों में जो प्रजातियां लगाना सुझाई थी, वह लगाई ही नहीं गई।
एक्सपर्ट व्यू : इसलिए हो रही हैं खत्म
वनस्पति विशेषज्ञ और पूर्व वन अधिकारी डॉ. सुदेश वाघमारे के मुताबिक, जंगलों पर दबाव कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। जंगल तैयार होने में कई दशक लग जाते हैं, लेकिन खत्म होनेे में ज्यादा समय नहीं लगता। प्रदेश में वनभूमियों पर नया जंगल पिछले कई दशकों में तैयार ही नहीं हुआ है, जबकि उनका दोहन लगातार होता जा रहा है।
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