संपादकीय

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महाभारत 2019: तीसरे मोर्चे के गठन में ही है मोदी का हित- विनोद के. जोस का विश्लेषण

प्रधानमंत्री अगले आम चुनाव जीतना चाहते हैं तो क्यों उन्हें इसके लिए सबसे ज्यादा प्रयास करने होंगे?

Danik Bhaskar

Jul 12, 2018, 01:44 AM IST
विनोद के जोस पत्रकार, एडिटर और विनोद के जोस पत्रकार, एडिटर और

मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की अपने इतिहास की सबसे शानदार जीत के कुछ घंटों बाद लालकृष्ण आडवाणी ने एक प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, जिसके बारे में लोगों को लगा कि यह ऐसे व्यक्ति की ओर से अनुचित है, जो उसी नाव में सवार है। उन्होंने कहा था, ‘मोदी के नेतृत्व, आरएसएस और भाजपा जैसे अन्य संगठनों के योगदान का विश्लेषण करना चाहिए। नतीजा मुख्यत: भ्रष्टाचार, कुशासन और वंशवादी शासन के खिलाफ आया है।’ ऐसा लगा कि आडवाणी सफलता का श्रेय एक व्यक्ति को नहीं देना चाहते थे। बेशक, हर कोई जानता था कि आडवाणी रूठे हुए थे, क्योंकि जिन मोदी को उन्होंने आगे बढ़ने में मदद की थी, उन्होंने इस वरिष्ठ नेता को पृष्ठभूमि में डाल दिया था। आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा को सत्ता में लाने में 24 दलों का गठबंधन लगा था। चाहे गठबंधन इस बार भी था पर पहली बार भाजपा 282 सीटें लाकर अपने बूते पर सत्ता में आई थी। इसमें विश्लेषण करने की क्या बात थी? पूरा श्रेय मोदी को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए था। मोदी ही अभियान के लिए फंड और नए आइडिया लाए थे। हर हर मोदी, घर घर मोदी, अच्छे दिन आने वाले हैं- यह सब एक ही आदमी के आसपास तैयार किए गए अभियान थे।
अब चार साल बाद नाकामियों के बारे में क्या ख्याल है? चाहे मीडिया अथवा विपक्षी दल उसे मुद्‌दा नहीं बना सकें पर जिस ‘भ्रष्टाचार’ और ‘कुशासन’ की आडवाणी 2014 में बात कर रहे थे वह धीरे-धीरे आम लोगों में मुद्‌दा बनता जा रहा है। लोग भिन्न स्तरों पर नाखुश हैं- शायद उत्तर की बजाय दक्षिण भारत में अधिक, शहरी के बजाय ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा, व्यापारियों से किसान ज्यादा। पेट्रोल-डीज़ल की अब तक की सबसे ऊंची कीमतें, संकट में फंसी खेती, व्यापारियों की जीएसटी से जुड़ीं चिंताएं, दलितों व अल्पसंख्यकों पर अत्याचार, ये ऐसे मुद्‌दे हैं, जिन्हें लेकर मोदी संघर्षरत हैं। अमित शाह जिस बैंक के डायरेक्टर थे उसने नोटबंदी के बाद पांच दिनों में 745 करोड़ रुपए स्वीकार किए, इस जैसी रिपोर्टें प्रमुख मीडिया घराने रोक लेते होंगे लेकिन, वॉट्सएप तथा सोशल मीडिया ऐसी खबरें लोगों में फैला रहे हैं। उपचुनावों की शृंखला और कर्नाटक में कांग्रेस और जद (एस) को आने से रोकने में अक्षमता ने संकेत दे दिया है कि मोदी-शाह का चुनावी जादू अब उतना नहीं चल रहा है। इसलिए मोदी का सर्वोत्तम हित इसी में है कि वे द्वि-ध्रुवीय संघर्ष को हर कीमत पर टालें। उन्हें 1977 या 1989 दोहराए जाने से रोकना होगा। पहली घटना में सारे दलों ने मिलकर इंदिरा गांधी को सत्ता से उतार दिया था और दूसरी घटना में 417 सीटें लेकर विजयी हुए राजीव गांधी को तब पराजय मिली जब समाजवादी, भाजपा और क्षेत्रीय दल सारे चुनाव को द्विध्रुवीय रखने पर सहमत हो गए। नेहरू के बाद कोई भारतीय नेता फिर चाहे इंदिरा गांधी, राजीव गांधी या नरेंद्र मोदी ही क्यों न हो एकजुट विपक्ष के सामने ठहर नहीं सका। क्योंकि भाजपा के सर्वश्रेष्ठ चुनाव अभियान में भी नरेन्द्र मोदी 31 फीसदी वोट ही खींच पाएं। यदि 15 प्रमुख दल एकजुट हो जाएं तो वोटों में उनकी हिस्सेदारी 40 फीसदी हो जाती है। इसलिए मोदी यथासंभव प्रयास करेंगे कि किसी भी तरह तीसरा मोर्चा बन जाए।
भारतीय राजनीति में परम्परागत रूप से तीसरे मोर्चे के लिए परदे के पीछे काम करने वाली ताकत मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी रही है। 1989 के बाद के लगभग सारे चुनावों में हरकिशन सिंह सुरजीत या प्रकाश करात ने पहल करके क्षेत्रीय दलों से बात कर ऐसी ताकत खड़ी करने का प्रयास किया, जो कांग्रेस व भाजपा से समान दूरी रखे। 1996 की तरह कुछ मामलों में वे सफल रहे और 2009 में मायावती व जयललिता के साथ प्रयासों में वे नाकाम रहे। भूतकाल के विपरीत पहली बार माकपा का ऐसा महासचिव था, जो पार्टी के खिलाफ जाकर कहां कि पार्टी को कांग्रेस के साथ ताल-मेल करना चाहिए। जाहिर है वामपंथ तीसरे मोर्चे की कोई पहल नहीं करेगा। और किसी क्षेत्रीय दल का इसे अंजाम देने का प्रभाव या इतिहास नहीं है। उस स्थिति में मोदी का सर्वोत्तम हित तीसरे मोर्चे के गठन में सहयोग देने में है ताकि 2019 का चुनाव द्विध्रुवीय न हो। तीसरा मोर्चा कैसे बनेगा।
जब तक कर्नाटक चुनाव का अनपेक्षित नतीजा नहीं आया था, जद (एस) और भाजपा के बीच कई चुनाव क्षेत्रों में स्पष्ट तालमेल था लेकिन, चुनाव के बाद देवेगौड़ा पिता-पुत्र अपने मर्जी से चले और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली। तब उम्मीद थी कि देवेगौड़ा तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर के साथ मिलकर राष्ट्रीय भूमिका निभाएंगे। ममता व केजरीवाल को गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा मोर्चे का हिस्सा माना जा रहा था। कुछ का मानना था कि डीएमके में भी भ्रम पैदा करके उसे इसमें शामिल किया जा सकता था। लेकिन, कर्नाटक चुनाव नतीजे के बाद तो इस पटकथा की संभावना खत्म लगती है। तीसरा मोर्चा बनने का दूसरा तरीका कांग्रेस के अहंकार से निकलता है। राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी के आसपास मौजूद लोग या हर राज्य के कांग्रेस नेता उनकी और उनकी पार्टी की अवास्तविक संभावनाएं उनके गले उतार दें, जिसके कारण अंतत: कांग्रेस का क्षेत्रीय ताकतों के साथ सीटों का उदार बंटवारा न हो सके। यदि कांग्रेस अन्यों को साथ लेने में नाकाम रही तो वोट बंट जाएंगे।
आगामी महीनों में मोदी को सिर्फ क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के भीतर मतभेद बढ़ाने होंगे। यदि गैर-भाजपा दल कांग्रेस के साथ आना चाहते हैं तो उन्हें उनके बीच के ऐतिहासिक फर्क को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का यह माइंड गेम समझना होगा। भाजपा और सरकार ने इमरजेंसी को जैसे याद किया उससे स्पष्ट है कि मोदी इस दिशा में काम कर रहे हैं। भाजपा प्रवक्ता ने क्षेत्रीय दलों को याद दिलाया कि कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई की उनकी एक साझी विरासत है। यह मतदाताओं को भी संदेश हैं कि भाजपा के खिलाफ कोई भी महागठबंधन अवसरवादी प्रयास होगा। द्विध्रुवीय चुनावी संघर्ष रोकने के लिए परदे के पीछे से सारी राजनीतिक जोड़-तोड़ करने के अलावा मोदी को दो अतिरिक्त चीजें करनी होंगी : इसे नेताओं के बीच चुनाव बनाना और लोगों को हर दल का भूतकाल याद दिलाते रहना ताकि भविष्य बनाने का उनके पास कोई मौका नहीं रहे। उस स्थिति में उदारता से सीटों का बंटवारा करने के अलावा विपक्ष के पास मोदी को रोकने का एक ही तरीका है कि वह 2019 के चुनाव को विचारों और मूल्यों तथा एक भविष्य की लड़ाई बनाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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