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एक्सपर्ट इंटरव्यू : घबराहट, मांसपेशियों में खिंचाव और सांसें तेज होने का कारण चिंता भी, ये कई बीमारी की वजह बनती है

चिंता का इलाज दवाई से हो सकता है। रिसर्च से पता चला है कि दिमाग़ में सेरटोनिन नाम के तरल पदार्थ में कमी हो सकती है।

Danik Bhaskar | Jul 09, 2018, 01:42 PM IST

हेल्थ डेस्क. चिंता और डर किसी भी व्यक्ति की सामान्य भावनाएं हैं। किसी भी तनाव की स्थिति में ये हमारी प्रतिक्रिया होती है। जैसे अगर हमारी जॉब छूट जाए या हमारे बच्चे की तबीयत खराब हो जाए तो चिंता होना स्वाभाविक है। इसे न तो नकारात्मक रूप लेने दें और न ही खुद पर हावी होने दें। अपोलो हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट और साइकोथैरेपिस्ट डॉ. अचल भगत से जानते हैं इससे कैसे निपटें...

सवाल : चिंता की शुरुआत कैसे होती है?
जवाब:
यह हमेशा किसी छोटी सी वजह से शुरू होती है। लेकिन जब हम इसे अधिक समय देने लगते हैं तो यह गंभीर हो जाती है। जैसे सिरदर्द रहता है और जब भी दर्द होता है तो सोचना शुरू कर देते हैं कि कोई ट्यूमर तो नहीं। बेटे की स्कूल बस देर से आती है तो वो सोचना शुरू कर देती हैं कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। इम्तिहान के रोज कन्फ्यूज हो जाते हैं भूल जाते हैं। इसे समय पर कंट्रोल न करने पर हार्ट डिजीज और ​ब्रेन डिसआॅर्डर की वजह भी बन सकती है।

सवाल: कैसे समझें कि चिंता करने के आदी रहे है?
जवाब:
चिंता अधिक बढ़ रही है या नहीं इससे तीन तरह से समझ सकते हैं। कुछ कॉमन लक्षणों के आधार पर इसे समझ सकते हैं जैसे...
1. शारीरिक लक्षण: चिंता या घबराहट में हमारे शरीर में कई प्रकार के लक्षण दिखते हैं जैसे कि दिल का जोरों से धड़कना, मांसपेशियों में खिंचाव होना, जल्दी-जल्दी सांस लेना, चक्कर आना, बेहोशी, बदहजमी होना इत्यादि। ऐसे व्यक्ति जिन्हें चिंता होती है वो इन लक्षण को अक्सर किसी और गंभीर बीमारी का लक्षण मान लेते हैं जैसे कि हार्ट की बीमारी
या अन्य। इससे चिंता और बढ़ जाती है।
2. व्यवहार : चिंता की स्थिति में हमारा व्यवहार सबसे पहले बदलता है। जैसे अगर हमें लिफ्ट में चढ़ने से घबराहट होती है और हम उसमें जाएं ही ना या जल्दी से उतर जाएं तो हमारी समस्या स्थायी हो जाती है।
3 विचार: ऐसी स्थिति में खुद से बातें करते हैं और अधिक निगेटिव सोचते हैं। यह चिंता या घबराहट का तीसरा मुख्य पहलू है।

सवाल: ऐसी स्थिति में सबसे पहले क्या करना चाहिए?
जवाब:
चिंता की स्थिति कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे...
1. चिंता के तीनों पहलू विचार, भावना, व्यवहार के निरंतर होने वाले चक्रव्यूह को समझें।
2. इस चक्रव्यूह से निकलने इसे पर से ध्यान हटाएं।
3. शारीरिक लक्षण से निपटने के लिए कोई रीलैक्सेशन एक्सरसाइज सीखें।
4. यूट्यूब पर प्रोग्रेसिव मस्क्युलर रीलैक्सेशन सर्च करने से कई वीडिओज मिलेंगे जिनसे तनाव दूर करने के तरीके सीख सकते हैं।
5. जो बातें आप अपने आप से कहते हैं या बुरा होने की जो कल्पनाएं करते हैं, उनके लिए अपना ध्यान कहीं और लगाएं।
4. हर व्यक्ति के ध्यान हटाने या डिसट्रेक्शन के तरीके अलग हो सकते हैं।

सवाल: चिंता बढ़े ही न इसके लिए क्या करें?
जवाब:
रोज की एक डायरी रखिए। इसमें तीन कॉलम बनाएं! पहले कॉलम में वो परिस्थिति नोट करें जिसमें घबराहट या चिंता हुई। दूसरे कॉलम में लिखें कि उस टाइम आप क्या सोच रहे थे। तीसरे कॉलम में लिखें कि आपने उस परिस्थिति में क्या किया। हर हफ्ते के अंत में अपनी डायरी को फिर से पढ़ें। क्या कोई विशेष तरह की सोच, कोई शैली दिखती या फिर कोई दायरा है? क्या हमेशा छोटी अड़चन को बड़ा बना लेते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको हमेशा अपने से सौ प्रतिशत की अपेक्षा रहती है। कुछ भी कमी होने पर हताश हो जाते हैं। अपने व्यवहार को बदलना भी जरूरी है। जिन परिस्थितियों में चिंता या घबराहट होती है उसमें धीरे-धीरे वापस जाने का प्रयास करें।

सवाल: डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए?
जवाब:
अगर चिंता फिर भी काबू में नहीं आती तो किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लें। चिंता की बीमारी का इलाज दवाई से हो सकता है। रिसर्च से पता चला है कि दिमाग़ में सेरटोनिन नाम के तरल पदार्थ में कमी हो सकती। इसके अलावा बातचीत से भी समस्या का समाधान किया जा सकता है इसे कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी कहते हैं। इसमें नकारात्मक सोच के तरीके समझकर उसे बदलने के कौशल सीखे जाते हैं।