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यहां औरतें धधकती आग पर चलकर ऐसे उतारती हैं मन्नत, बाल और साड़ी में भी नहीं लगती आग

3 वर्ष पहले
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 ईचागढ़ (जमशेदपुर). बांग्ला का पोइला बैशाख के अवसर पर रविवार को चड़क पूजा धूमधाम से मनाया गया। मौके पर व्रत रखी हुई महिलाओं ने धधकती हुए आग की लपटों में बारी बारी से 9 बार चलकर आस्था और विश्वास की मिशाल पेश की। साथ ही साथ रात भर मानभूम शैली की छऊ नृत्य प्रस्तुत किए गए। 

 

- मुखिया रामेश्वर उरांव ने बताया कि यह गांव की परंपरा है। महिला-पुरुष भक्त तीन दिनों तक उपवास रखकर कलश स्थापन कर शिव व मां काली की आराधना करते हैं।
- ग्वालीन ने बताया कि तीन दिनों तक उपवास कर लहलहाती आग में चलने से देव कृपा से रोग नहीं होता है। 
- पीठ में हूक से हुए घाव 8-10 दिन में बिना दवा के ही ठीक हो जाते हैं, यह भगवान पर विश्वास का प्रतिफल है। 
- आग प्रज्वलित होते ही इस माहौल को देखने के लिए दूर-दराज के सैकड़ों लोगों का हूजुम उमड़ पड़ता है। 

 

इसी तरह पुरूष भी लटक जाते हैं हुक के सहारे

 

- श्री श्री चड़क पूजा मेला कमेटी, तुपुडांग (सरजामदा) के अध्यक्ष भीमसेन भूमिज ने बताया- हर साल चड़क पूजा के बाद मेले का आयोजन किया जाता है।
- छऊ के अलावा कई नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। चड़क में शिव-पार्वती की पूजा होती है।
- पूजा के दौरान श्रद्धालु मन्नत मांगते हैं और जिनकी मन्नत पूरी होती है, वे स्वेच्छा से लकड़ी के बने चालीस फीट ऊंचे कोल्हू में से चार चक्कर लगाते हैं।
- उनकी पीठ में एक हुक लगाया जाता है। जानकारों के मुताबिक वो हुक का निशान बिना दवाई के 8-10 दिन में ठीक हो जाता है।
- ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से श्रद्धालु की जो मनोरथ पूरी हुई होती है वह आगे भी कायम रहती है।