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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष: प्रकृति साल में जितना बनाती है, हम 7 माह में खत्म कर रहे हैं

इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान भारत है और थीम है- ‘प्लास्टिक प्रदूषण को हराएं’।

Dainik Bhaskar

Jun 05, 2018, 08:10 AM IST
World Environment Day special by bhaskar

प्रकृति ने इंसानों को बहुत कुछ दिया है, लेकिन मनुष्य ने प्रकृति का दोहन नहीं, शोषण शुरू कर दिया है। अब वह सालभर के प्राकृतिक संसाधन सात महीने में ही खर्च कर देता है। आज विश्व पर्यावरण दिवस पर जानते हैं, यह कैसे, क्यों हो रहा है? और उपाय क्या हैं? इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का मेजबान भारत है और थीम है- ‘प्लास्टिक प्रदूषण को हराएं’।

हम कितना ज्यादा प्रकृति का दोहन कर रहे हैं?

जल: 30 साल में दो गुना से ज्यादा हो जाएगी दुनिया भर में पीने के पानी की मांग

- संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2050 तक पानी की मांग मुकाबले 55% ज्यादा हो जाएगी। जमीन में पानी का स्तर हर साल 3.2% तक घट रहा है। जलस्रोत सूख रहे हैं। नदियों में भी अब पानी घटने लगा है। हालात यह है कि 2025 तक भारत पानी की भीषण कमी से जूझने वाले देशों में शामिल हो जाएगा। पानी अब पहले के मुकाबले चौथाई ही रह गया है।

10 लाख: लीटर सालाना प्रति व्यक्ति है भारत में पानी की उपलब्धता। 1951 में यह 30 से 40 लाख लीटर थी। यानी पिछले 67 साल में चार गुना कम हो गई है।

9.7 करोड़: लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पा रहा है भारत में। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक जमीन में जल स्तर तेजी से घट रहा है।

जमीन: दुनिया में सबसे ज्यादा खनन रेत का, तेल और प्राकृतिक गैस को भी पीछे छोड़ा

- भारत में कीटनाशकों और खाद के ज्यादा प्रयोग से हर साल 5334 लाख टन मिट्टी खत्म हो रही है। रेत और बजरी ऐसा प्राकृतिक संसाधन हो गया है, जिसका इंसान सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है। रेत के खनन ने तेल और प्राकृतिक गैस को भी पीछे छोड़ दिया है। वियतनाम में रेत की मांग वहां के कुल रिजर्व से ज्यादा हो गई है।

01 सेंटीमीटर: मिट्टी की परत बनने में एक हजार साल लगते हैं। 150 साल में ऊपरी परत खत्म हो गई है। जिस गति से बन रही है उससे सौ गुना तेजी से हम खत्म कर रहे हैं।

16.4 टन: उपजाऊ मिट्टी सालाना खत्म हो रही है प्रति हेक्टेयर भारत में। इसमें सुधार से 55% कृषि आबादी को रोजगार और खाद्य सुरक्षा मिल सकती हैं।

जंगल: हर एक मिनट में दुनिया में काटे जा रहे हैं 48 फुटबॉल मैदानों के बराबर जंगल

- भारत में हर साल 1.3 करोड़ एकड़ वन क्षेत्र काटे या जलाए जा रहे हैं। इको सिस्टम को बनाए रखने में पेड़ों की अहम भूमिका है। इनसे भोजन मिलता है। पानी फिल्टर होता है और ये कार्बन को सोख लेते हैंं। वृक्ष सूखे और मौसम की भीषणता को रोकते हैं। फिर भी एक अनुमान के अनुसार हर मिनट दुनिया में 48 फुटबॉल मैदान के बराबर पेड़ काट दिए जाते हैं। 15% ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन पेड़ों की कटाई की वजह से बढ़ रहा है। दुनिया में जितने भी पक्षी मौजूद हैं, उनमें से 70% फार्म में होने वाले चिकन और अन्य पक्षी हैं। नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस की रिपोर्ट में कहा गया है कि 83% मेमल्स के लुप्त होने का कारण इंसान ही है।

0.01%: ही है हम 760 करोड़ इंसान धरती के कुल बायोमास का। फिर भी धरती को सबसे ज्यादा नुकसान हम पहुंचा रहे हैं। धरती पर बैक्टीरिया 13%, प्लांट 83%, अन्य का वजन 5% है।

हवा: हर साल दुनिया में करीब 35 लाख लोग वायु प्रदूषण के कारण गंवा रहे हैं जान

- कोयले से चलने वाले पावर प्लांट वायु प्रदूषण का अहम कारण हैं। कुल वायु प्रदूषण में इनकी 80% हिस्सेदारी है। भारत में वायु प्रदूषण की वजह से 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ता हैै। एन्वायर्नमेंटल परफॉरमेंस इंडेक्स में इस साल भारत खराब एयर क्वॉलिटी के मामले में दुनिया के 180 देशों में 177 वें स्थान पर रखा है।

75% तक है शहरों में वायु प्रदूषण में वाहनों की हिस्सेदारी। दिल्ली और बीजिंग खराब एयर क्वॉलिटी की वजह से सुर्खियों में रहे हैं।

10 अरब मीट्रिक टन कार्बन वायुमंडल में हर साल इंसानों द्वारा छोड़ा जा रहा है। इस कारण आबोहवा और समुद्री जल कार्बन से भर चुका है।

इस दोहन का क्या असर हो रहा है?

- 1.7 धरती चाहिए आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए। इसी गति से खपत करते रहे, तो 30 से 40 सालों में 4 धरती की जरूरत होगी। लेकिन अगर विकसित देशों की तरह बाकी देश भी आज खपत करें, तो हमें अभी ही 4 धरती चाहिए।

- 0.8 डिग्री बढ़ गया है धरती का तापमान 1950 से अब तक।

- 5 करोड़ से ज्यादा पर्यावरणीय शरणार्थी होंगे 2020 तक। जब लोग जीने की हालत में नहीं रह पाते, तभी वे अपने घरों को छोड़ दूसरी जगह जाते हैं।

- 1 लाख से ज्यादा व्हेल, सील, कछुए और जलीय जंतु प्लास्टिक खाने से हर साल मर जाते हैं।

- 15 अरब पेड़ काट दिए जाते हैं दुनिया में हर साल।

- 3.2 अरब लोग पानी की तंगी से और 60 करोड़ लोग भोजन की तंगी से गुजरेंगे 2080 में।

मलेरिया, फ्लू जैसी बीमारियां ग्लोबल वार्मिंग के कारण पूरे साल फैलेंगी। पहाड़ों पर ठंड के बावजूद मलेरिया फैलेगा।

(कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक स्टीफन मोर्स के अनुसार।)

पृथ्वी पर प्रकृति हमारे लिए सालभर में जितना बनाती है, हम उससे ज्यादा का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2017 में हमने प्रकृति द्वारा सालभर के लिए दिए गए संसाधनों को 2 अगस्त तक खत्म कर दिया था। यूके का न्यू इकोनॉमिक फाउंडेशन हर साल अर्थ ओवरशूट डे मनाता है। यह वह दिन होता है, जो बताता है कि इस साल प्रकृति ने हमें जितना दिया था, उतना हमने खत्म कर दिया है। इंसान हर साल प्राकृतिक संसाधनों को इस्तेमाल बढ़ाता जा रहा है, इसलिए हर साल यह दिन आगे बढ़ता जा रहा है। 2006 में जब अर्थ ओवरशूट डे की शुरुआत हुई थी तब यह अक्टूबर में आया था।

4 उपाय क्या हैं जो हम कर सकते हैं?

1) दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना पेपर खपत 52 किलो है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने कागजी प्रतियों की संख्या में कमी कर दी है। इससे करीब 2,100 पेड़ और करोड़ों लीटर पानी बचेगा।

- डिजिटल माध्यमों को बढ़ाकर कागज के उपयोग को घटाना हमारे हाथ में है।

2) दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का 80% हिस्सा पेट्रोल, डीजल से पूरा होता है। जर्मनी के सबसे बड़े शहर बर्लिन में 78% लोग आने-जाने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करते हैं।

- रोजाना के कुछ काम साइकिल से कर ही सकते हैं। कार-स्कूटर पूल बनाना हमारे हाथ में है।

3) 36 पेड़ रोज बचेंगे अगर देश में रेलवे टिकट का प्रिंट न लें। रोज तीन लाख टिकट बुक होते हैं। एक पेड़ से ए-4 साइज की 8335 शीट बनती हैं।

4) दुनिया में हर सेकंड आठ टन प्लास्टिक बनता है। हर साल कम से कम 60 लाख टन प्लास्टिक कूड़ा समुद्र में पहुंच रहा है। एक प्लास्टिक की थैली औसतन सिर्फ 25 मिनट ही इस्तेमाल होती है। भारत में रोज 20 गाय पॉलिथीन खाने से मरती हैं। पॉलिथीन पर रोक तो लगाई गई है, लेकिन इसका पालन नहीं हो रहा है।

- कपड़े के बने बैग का इस्तेमाल कर पॉलिथीन को रोकना हमारे हाथ में है।

सरकार क्या कर सकती है?

1) 30% घट सकता है वायु प्रदूषण अगर सरकार ठोस कचरे को खत्म करने का पुख्ता इंतजाम करें तो।

2) 30% वाहन कम हो सकते हैं सड़कों पर अगर सरकार दफ्तराें में छुट्टी का दिन अलग-अलग कर दें तो।

3) मांस की खपत घटाना, उपजाऊ और बंजर जमीन का वर्गीकरण। फर्टिलाइजर का सीमित उपयोग।

- इथोपिया ने इन उपायों से करीब 1.7 करोड़ एकड़ जमीन को उपजाऊ बनाया है।

4) ऊर्जा के विकल्पों और पर्यावरण की सुरक्षा पर ध्यान देने की जरूरत। कचरे का पूरा ट्रीटमेंट जरूरी।

- नॉर्वे का ओस्लो दुनिया का सबसे साफ शहर है। यहां कचरे से बने ईंधन से बसें चलाई जा रही हैै।

5) धरती पर 3 लाख करोड़ से ज्यादा पेड़-पौधे हैँ यानी प्रति व्यक्ति 422 पेड़।

- हर साल 150 करोड़ पेड़ काटे जा रहे हैं। लेकिन अकेले अमेरिका में ही हर साल 160 करोड़ पेड़ लगाए जाने का भी दावा है।

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