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श्रीकृष्ण की पूजा में एक गलती भूलकर भी न करें, वरना पूजा हो जाएगी बेकार

पूजा में हुए एक भूल के कारण बढ़ता है पाप, शुरू हो सकता है दुर्भाग्य

Dainik Bhaskar

Jun 03, 2018, 05:29 PM IST
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रिलिजन डेस्क। घर की गरीबी दूर करने के लिए और दुर्भाग्य से मुक्ति के लिए भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा विशेष रूप से की जाती है। श्रीहरि की पूजा से देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं। उज्जैन के इंद्रेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी और भागवत कथाकार पं. सुनील नागर के अनुसार विष्णुजी और उनके अवतार श्रीराम, श्रीकृष्ण की पूजा में एक बात का खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए। जब भी हम श्रीकृष्ण की पूजा करें या भगवान के दर्शन करें तो उनकी पीठ के दर्शन नहीं करना चाहिए। इस संबंध में शास्त्रों में एक कथा बताई गई है।

यहां जानिए ये कथा...

> पं. नागर के अनुसार विष्णुजी के दर्शन करते समय इनकी पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इनकी पीठ पर अधर्म का वास है। पीठ के दर्शन न करने के संबंध में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की एक कथा प्रचलित है।

> जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे, तब जरासंध का एक साथी असुर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा। कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा। तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले।

> इस प्रकार रणभूमि से भागने के कारण ही श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा। जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे, तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा। इस तरह भगवान रणभूमि से भागे, क्योंकि कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे और श्रीकृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है।

> कालयवन कृष्णजी की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढ़ने लगा, क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है। उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है। जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया तब श्रीकृष्ण एक गुफा में चले गए।

> गुफा में जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था। मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को नींद से जगाएगा और राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्णजी समझकर उठा दिया और राजा की नजर पढ़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया।

> इसीलिए भगवान श्रीहरि की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए, क्योंकि इससे हमारे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है और अधर्म बढ़ता है। विष्णुजी के हमेशा ही मुख की ओर से ही दर्शन करना चाहिए।

> अगर भूलवश श्रीकृष्ण की पीठ के दर्शन हो जाते हैं और भगवान से क्षमा याचना करनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस पाप से मुक्ति के लिए कठिन चांद्रायण व्रत करना होता है। इस व्रत के कई नियम बताए गए हैं। जैसे-जैसे चंद्र घटता जाता है, ठीक उसी प्रकार व्रती को खान-पान में कटौती करना होती है और अमावस्या के दिन निराहार रहना पड़ता है।

> अमावस्या के बाद जैसे-जैसे चांद बढ़ता है ठीक उसी प्रकार खान-पान में बढ़ोतरी की जानी चाहिए और पूर्णिमा के बाद यह व्रत पूर्ण हो जाता है। ऐसा करने पर भक्त की आराधना से श्रीहरि अतिप्रसन्न होते हैं और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं।

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