संपादकीय

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महाभारत 2019 के तहत योगेन्द्र यादव का विश्लेषण: देश को विपक्ष नहीं, विकल्प की जरूरत

मोदी सरकार को चुनौती देना है तो लोगों के सामने कोई बड़ा सपना पेश करना होगा।

Danik Bhaskar

May 30, 2018, 10:28 AM IST
योगेन्द्र यादव। योगेन्द्र यादव।

‘आखिर मोदीजी के अश्वमेध का घोड़ा हमने बांध ही लिया’। शब्द कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के थे, लेकिन ऐसा कुछ भाव बेंगलुरू में उपस्थित सभी विपक्षी नेताओं के चेहरे पर था। नेताजी ही नहीं, टीवी पर चर्चा करने वाले वे तमाम चेहरे भी मुदित थे, जो काफी देर से मोदीजी के देशव्यापी अश्वमेध के रुकने का इंतज़ार कर रहे थे। मन ही मन वे सब जानते थे कि इस बयान में अतिशयोक्ति है। मोदीजी का घोड़ा गुजरात चुनाव में ठिठका था, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में झटका खाकर त्रिपुरा में संभला था और कर्नाटक में फिर रुक गया। सच यह है कि विजयी अश्व अभी बंधा नहीं, बस अटका है।


जब घोड़ा अटक ही गया है तो हमें भी ठिठक कर सोचना चाहिए: इस अश्वमेध यज्ञ का लक्ष्य क्या है? भाजपा वाले कहते हैं कांग्रेस मुक्त भारत। मेरे मन में कांग्रेस भारत के स्वधर्म के पतन की प्रतीक है। कांग्रेस की विजय का मतलब है लोक पर तंत्र की विजय। मेरे लिए कांग्रेस वह भ्रष्टाचार रूपी घास है जो उखाड़े नहीं उखड़ती। इस अर्थ में देश को कांग्रेस मुक्त करना एक राष्ट्रीय यज्ञ होना चाहिए। लेकिन, जो पिछले चार साल से चल रहा है वह यह यज्ञ तो नहीं है। पिछले चार साल से इस यज्ञ को चलाने वाले हर उस हथकंडे और कुकर्म को अपना रहे हैं, जो कांग्रेस किया करती थी। आज भाजपा कांग्रेस मुक्त नहीं बल्कि कांग्रेस युक्त भारत का सबसे बड़ा वाहन है। भाजपा को कांग्रेसियों से मुक्ति चाहिए ताकि वे धड़ल्ले से वह सब कर सकें जो कांग्रेस किया करती थी। यह मर्यादा, कानून और संविधान की बंदिशों से मुक्ति का सर्वसत्ता यज्ञ है। विरोध, विपक्ष और विकल्प की हर संभावना को मिटा देने का अश्वमेध है।


जाहिर है लोकतंत्र में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस अभियान से जुड़ नहीं सकता। इसलिए कायदे से मुझे भी कर्नाटक में घोड़े के अटक जाने से खुश होना चाहिए था। मगर मैं बेंगलुरू के जमावड़े से तनिक भी उत्साहित नहीं हो पाया। घुड़दौड़ में भाजपा को बहुमत से पहले रोकना या फिर घोड़ा मंडी में परचून की बिक्री को थोक की डील से रुकवाना एक बात है, अश्वमेध के घोड़े को रोकना दूसरा खेल है।


मेरी शंका सिर्फ इतनी नहीं थी कि यह विपक्षी एकता कितनी टिकाऊ होगी। उसके बारे में तो अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। अभी तो मैं बेंगलुरू की विपक्षी एकता की तमाम फोटो में एक भी ऐसी फोटो भी नहीं ढूंढ़ पाया हूं, जिसमें वहां उपस्थित सभी विपक्षी नेता एक साथ दिख जाएं। बड़ी ग्रुप फोटो में नायडू और ममता नदारद हैं, बाकी फोटो में वे दोनों हैं तो अन्य नेता नहीं। नवीन पटनायक आए नहीं, चंद्रशेखर राव पहले आकर चले गए, और एक बार लालूजी के साथ फोटो खिंचवाकर फंसे केजरीवाल इस बार फोटो से दूर रहे। यानी कि अभी विपक्षी एकता का गोंद पक्का नहीं हुआ है। इतनी कच्ची रस्सी से अश्वमेध का घोड़ा बंधेगा नहीं। शंका सिर्फ ये भी नहीं थी कि विपक्षी एकता से चुनाव में कितना फायदा होगा।

सच यह है कि देश के आधे से ज्यादा राज्यों में बीजेपी विरोधी एकता का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि वहां या तो सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा में मुकाबला है या फिर भाजपा वहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत है ही नहीं। अगर गठबंधन का फायदा है तो मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों तक सीमित है। इन राज्यों में प्रभावी गैर-भाजपा गठबंधन से 50 से 70 सीटों का फर्क पड़ सकता है। मगर याद रहे कि इन राज्यों में भी भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने का दीर्घकालिक असर यही होगा कि भाजपा का अपना जनाधार बढ़ेगा।


मेरी असली शंका यह है कि खाली भाजपा विरोधी एकता से क्या जनता में आशा का संचार होगा? आज देश को सिर्फ विरोध नहीं, विश्वास की तलाश है। सिर्फ विपक्ष नहीं विकल्प की जरूरत है। चार साल तक मोदीजी के जुमलों से त्रस्त जनता अब कोई ऐसा नेतृत्व ढूंढ़ रही है जिसके कर्म और वचन दोनों पर भरोसा किया जा सके। क्या बेंगलुरू के ग्रुप फोटो में उन्हें कोई भी ऐसा चेहरा दिखाई दिया होगा?


मेरी शंका इसलिए है कि चुनाव सिर्फ वोटों का अंकगणित नहीं होता जिसमें दो और दो चार हो जाएं। चुनाव अंततः लोगों के भरोसे का सवाल है। अगर मोदी सरकार का विकल्प खड़ा करना है तो देश के सामने कोई बड़ा सपना पेश करना होगा। भाजपा विरोधी जमावड़ा क्या ऐसा सपना पेश करेगा? क्या बंगाल के पंचायत चुनावों में तांडव रचने वाली ममता बनर्जी को बगल में खड़ा कर राहुल गांधी देश को मोदी और शाह के अलोकतांत्रिक हथकंडों से मुक्ति का सपना दिखाएंगे? क्या शरद पवार, मायावतीजी, लालूजी के सुपुत्र, चंद्रशेखर राव और करुणानिधि के वंशज देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का सपना दिखाएंगे? क्या आजम खान की समाजवादी पार्टी (या संभवतः शिवसेना भी) देश को धर्मनिरपेक्षता का रास्ता दिखाएगी?


सिद्धांत और नैतिकता की बात भूल भी जाएं, तो क्या यह विपक्षी एकता भाजपा का मुकाबला करने लायक संकल्प, ऊर्जा और रणकौशल पैदा कर पाएगी? इसमें कोई शक नहीं कि आज अमित शाह की चुनावी मशीन का कोई मुकाबला नहीं है। चुनाव जीतने के लिए राम, दाम, संघ, भेद सहित हर जायज़ और नाजायज तरीके को इस्तेमाल करने वाली इस मशीन की तोड़ कैसे बनेगी? कांग्रेस के पास तो जमीन पर संगठन है नहीं, उसकी भरपाई कौन करेगा? तो फिर इस अश्वमेध यज्ञ में क्या होगा? कर्नाटक चुनाव के बाद से हर किसी कि जुबान पर यही सवाल है। टीवी एंकर के साथ सारा देश अश्वमेध को घुड़दौड़ समझ एक सटोरिए कि मानसिकता में आ गया है। कौन जीतेगा? कितनी सीटें? कौन किसके साथ जुड़ेगा? सरकार कितनी चलेगी?


कोई यह नहीं पूछ रहा की इस अश्वमेध में गणतंत्र रूपी अश्व का क्या होगा? वैदिक परम्परा के अनुसार या तो विपक्षी राजा अश्व को पहले बांधेंगे, फिर उसका वध कर देंगे। या फिर यह यज्ञ सफल होगा, विजय के प्रतीक अश्व का गाजे-बाजे के साथ स्वागत होगा। और फिर मंत्रोच्चार के साथ उस अश्व की बलि दी जाएगी। वध या फिर बलि! क्या हमारे गणतंत्र के सामने कोई तीसरा रास्ता बचा है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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