विज्ञापन

महाभारत 2019: चुनावी खींचतान में लोकतंत्र का गौरव न गंवाएं- योगेन्द्र यादव का विश्लेषण / महाभारत 2019: चुनावी खींचतान में लोकतंत्र का गौरव न गंवाएं- योगेन्द्र यादव का विश्लेषण

Bhaskar News

Sep 05, 2018, 11:48 PM IST

संदर्भ: मतदान पर विपक्ष की चिंता गलत नहीं लेकिन, पुरानी व्यवस्था के साथ पुरानी बीमारियां लौट आएंगी

योगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्य योगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्य
  • comment

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एक प्रार्थना और एक प्रस्ताव है। प्रार्थना यह कि इस चुनाव में और कुछ भी चर्चा हो, कम से कम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन और पेपर बैलेट की चर्चा न हो। और प्रस्ताव यह कि इस बहस को पर्ची वाली नई इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से सुलझा लिया जाए, बशर्ते कि गिनती करने की प्रक्रिया में कुछ सुधार कर लिए जाएं। प्रार्थना उन पार्टियों से जो पिछले सप्ताह चुनाव आयोग के पास सर्वदलीय बैठक में गई थीं। खास तौर पर उन पार्टियों से जिन्होंने ईवीएम की जगह वापस पेपर बैलेट लाने की मांग की थी।


प्रार्थना है कि आप अपने एतराज को घुमा-फिरा कर न कहें। आप भी जानते हैं कि असली समस्या मशीन में नहीं है। इसी मशीन के जरिये बीजेपी दिल्ली और बिहार में हारी थी, गुजरात में अपमानित हुई और कर्नाटक में सत्ता से चूक गई। आसार तो यही हैं कि यही ईवीएम बीजेपी को राजस्थान में और शायद मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ में भी हरा देगी। आपकी असली चिंता मशीन की चाल को लेकर नहीं है बल्कि आपको डर है कि मोदी और शाह की जोड़ी चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती है। आपको यह संदेह भी है कि चुनाव आयोग भी उनके इशारे पर झुक सकता है। आपकी चिंता गलत नहीं है। लेकिन, उसका समाधान ईवीएम छोड़कर बैलेट पेपर से नहीं निकलेगा। पुराने कागज के मतपत्र वाली व्यवस्था में लौटने से पुरानी बीमारियां भी लौट आएंगी। मतपत्रों की छीना-झपटी होगी, बूथ कैप्चरिंग ज्यादा आसान हो जाएगी और मतगणना की हेराफेरी भी आसानी से होगी। चुनाव आयोग की साख बेशक गिरी है, लेकिन इसका समाधान पूरे सिस्टम को छोड़ देना नहीं है।
एक प्रार्थना बीजेपी से भी। आप अपनी आक्रामक शैली में ईवीएम और चुनाव आयोग का समर्थन करना बंद कर दें। याद करें कि कल तक चुनाव हारने के बाद आपके नेता ही ईवीएम के विरुद्ध किताब लिखा करते थे, उसे बदलने की मांग किया करते थे। यह भी याद रखें कि इस देश के इतिहास में पहली बार किसी चुनाव आयुक्त का नाम लेकर चुनावी रैलियों में उसका मखौल उड़ाने की सस्ती राजनीति नरेंद्र मोदी जी ने ही 2002 में की थी। इसलिए जब आप ईवीएम के गुणों और चुनाव आयोग में आस्था के भाषण देते हैं तो लगता है कि दाल में कुछ काला है। अब एक प्रस्ताव चुनाव आयोग, पार्टियों और देश के सामने। प्रस्ताव यह है कि हम पुरानी ईवीएम पर बहस छोड़कर नई पर्ची वाली ईवीएम की बात करें और उसमें कुछ सुधार कर लें। मशीन में सुधार की जरूरत नहीं है, बस मशीन की जांच और वोट की गिनती के तरीके में कुछ बदलाव की जरूरत है। पुरानी ईवीएम पर बहस इसलिए बंद होनी चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि आगामी चुनाव में देशभर में नई मशीन लग जाएगी। इनका प्रयोग हो चुका है और पर्याप्त संख्या में मशीनें ऑर्डर की जा चुकी हैं। इस नई मशीन का फायदा यह है कि वोट डालने के बाद एक पर्ची निकलती है, जिसे वोटर और सिर्फ वोटर ही देख सकता है। पर्ची में उस पार्टी या उम्मीदवार का निशान छपा होता है, जिसे उस वोटर ने वोट दिया है। पर्ची को कोई हाथ नहीं लगा सकता। वोटर के देखने के बाद पर्ची डब्बे में गिर जाती है और वहां सील बंद रहती है। जरूरत हो तो सील तोड़कर पर्चियों की गिनती हो सकती है और मशीन की गिनती और पर्चियों की गिनती का मिलान किया जा सकता है। इस मशीन का फायदा यह है कि अब आपको ईवीएम के सॉफ्टवेयर पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है। चाहे ईवीएम की जो भी हैकिंग कर ली जाए, लेकिन अगर वोटर अपनी आंख से पर्ची की जांच कर सकता है, और जरूरत पड़ने पर पर्ची और मशीन की गिनती का मिलान हो सकता है, तो चुनाव में धांधली की संभावना नहीं रहती।
बस इस व्यवस्था को पूरी तरह संदेह मुक्त करने के लिए कुछ सुधारों की जरूरत है। पहला तो यह कि चुनाव आयोग ‘हैकथन’ करवाने की बजाय चुनाव से 10 दिन पहले ही सभी पार्टियों और उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को यह मौका दे कि वे उस चुनाव में प्रयोग आने वाली मशीनों में किसी भी मशीन को चुनकर एक्सपर्ट से उसकी जांच करवा सकें। इससे मशीनों पर जनता और पार्टियों का भरोसा बढ़ेगा। दूसरा सुधार यह होना चाहिए कि अगर किसी मशीन में वोटिंग के समय गड़बड़ी की शिकायत होती है तो उसे आधे घंटे के अंदर बदला जाए। नहीं तो उस बूथ पर दुबारा चुनाव हो। कर्नाटक चुनाव और कई उपचुनावों में यह शिकायत मिली कि मशीन बदलने में बहुत वक़्त लग जाता है। इससे बिना वजह संदेह बढ़ता है। तीसरे, अगर कोई वोटर यह शिकायत करें कि उसकी पर्ची पर वह चुनाव चिह्न नहीं था, जिसे उसने वोट किया था, तो उसकी शिकायत दर्ज करने की कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए। अगर किसी बूथ पर 10 या उससे अधिक वोटर यह शिकायत करें तो मतगणना के समय उस बूथ की पर्चियों और मशीन की गिनती का मिलान अनिवार्य होना चाहिए।
चौथा और महत्वपूर्ण बदलाव मतगणना की प्रक्रिया में करना होगा। नई व्यवस्था में भरोसा बनाने के लिए जरूरी है की मतगणना की शुरुआत और अंत में कुछ बूथों में पर्चियों और मशीन की गिनती का मिलान कर लिया जाए। मतगणना के लिए आमतौर पर 14 टेबल इस्तेमाल की जाती हैं। मतगणना की शुरुआत में ही हर टेबल पर एक मशीन का लॉटरी से चयन कर लिया जाए और सबसे पहले उन 14 मशीनों में पर्ची और मशीन की गिनती का मिलान कर लिया जाए। अगर वह सही पाई जाएं तभी उसके बाद बाकी बूथों की वैसे ही गिनती हो, जैसे आज होती है। व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए गिनती के अंत में दूसरे नंबर पर आए हुए उम्मीदवार को यह विकल्प दिया जाए कि वह हर टेबल पर अपनी पसंद के किसी एक बूथ की पर्चियों की गिनती करवा सके। उसके बाद ही परिणाम घोषित किया जाए।
अगर इस प्रक्रिया में कहीं भी गंभीर विसंगति पाई जाती है तो पूरे चुनाव क्षेत्र में दोबारा वोट डाले जाएं। भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी उपलब्धि यह रही है कि हमारे यहां हारने वाली पार्टी भी चुनाव परिणाम स्वीकार करती है। इसलिए चुनाव आयोग से प्रार्थना है कि वो अहम को छोड़ें, पार्टियों से प्रार्थना है वो अपनी ज़िद छोड़ें। कहीं हम इस चुनावी खींचतान में लोकतंत्र का गौरव न गवां बैठें। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

X
योगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्ययोगेन्द्र यादव, सामाजिक कार्य
COMMENT
Astrology

Recommended

Click to listen..
विज्ञापन

किस पार्टी को मिलेंगी कितनी सीटें? अंदाज़ा लगाएँ और इनाम जीतें

  • पार्टी
  • 2019
  • 2014
336
60
147
  • Total
  • 0/543
  • 543
कॉन्टेस्ट में पार्टिसिपेट करने के लिए अपनी डिटेल्स भरें

पार्टिसिपेट करने के लिए धन्यवाद

Total count should be

543
विज्ञापन