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खुमारी उतरने के बाद \'आप\' का क्या होगा?

6 वर्ष पहले
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निष्पक्षता किसी पत्रकार का पहला मंत्र होता है और बीबीसी में तो यह ईमान की बात है.

लेकिन क्या हम यह नहीं जानते कि हमारे भीतर से उठने वाली आवाज़ें हमेशा हमारे पेशे की कसौटी से इत्तेफाक़ नहीं रखतीं.

(पढ़ेंः शपथ ग्रहण में शामिल नहीं हो पाएंगे मोदी)

कई बार हम ख़ुद को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहां हम अपनी ही रिपोर्टों के सभी पहलुओं से पूरी तरह से सहमत नहीं हो पाते.

पढ़ें विस्तार से

लगता है जैसे कोई भीतर से बगावत करने पर उतारू हो जाता है पर हमारा रिपोर्टर है जो वही कहता है जो वह देखता या सुनता है.

(पढ़ेंः दिल्ली चुनाव में \'आप\' किसके बूते जीती?)

हमारे राजनीतिक संवाददाता ज़ुबैर अहमद ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को कवर किया और रिपोर्टिंग के दौरान कई ऐसे लम्हे आए जब वे दुविधा में पड़ गए और उन्होंने ख़ुद को एक असहज स्थिति में पाया.

उन्हें कई बार अपने द्वंद्व से जूझना पड़ा. इस सूरत में कई बार उनके जेहन में ही ख़ुद से गुफ़्तगू चलने लगती है.

रिपोर्टिंग की इसी मुश्किल भरी पेसोपेश को उन्होंने बीबीसी हिंदी के पाठकों के साथ साझा किया है.

मोदी-शाह की जोड़ी

रिपोर्टर कहता है, \"मुक़ाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच है, कांग्रेस पार्टी कहीं भी रेस में नहीं है. नरेंद्र मोदी की भाजपा और अरविंद केजरीवाल की \'आप\' के बीच कांटे की टक्कर है हालांकि कई लोग यह मानते हैं कि \'आप\' को बढ़त हासिल है.\"

(पढ़ेंः दिल्ली के बाद बिहार में \'आप\' की उम्मीदें)

भीतर से आवाज़ आती है, \"तुम्हें दिखाई नहीं देता कि दिल्ली वालों का दिल \'आप\' के लिए बल्ले-बल्ले कर रहा (केवल धड़क नहीं रहा) है. क्या तुमने बीजेपी के लोगों का हाव-भाव नहीं देखा. यह साफ़ है कि मोदी और शाह की जोड़ी की बुरी तरह शिकस्त होने वाली है. तुम्हें क्या लगता है. केवल सभी पार्टियों का नज़रिया ही सामने मत रखो.\"

राजनीति की रणनीति

रिपोर्टर लिखता है, \"आम आदमी पार्टी ज़मीनी लोकतंत्र का नाम है. यह अलग तरह की पार्टी है. यह पानी, बिजली, ट्रैफ़िक जाम और दिल्ली के बेघर लोगों को घर देने की बात करती है. यह शहर के निचले तबकों को छूती है. व्यापक पैमाने पर जनसंपर्क करना इसकी रणनीति है. सत्ता के हाशिये पर छूट गए लोगों को आवाज़ देना इसका मक़सद है. \'आप\' ख़ुद भी सत्ता के ढांचे में फ़िट नहीं बैठती.\"

(पढ़ेंः क्या जनता का बीजेपी से मोहभंग हो गया)

मन कहता है, \"आम आदमी पार्टी के चुनावी वायदे बीजेपी के वायदों से किस तरह अलग हैं? केजरीवाल बुनियादी नागरिक सुविधाओं की बात करते हैं, बीजेपी और कांग्रेस भी ऐसा ही कहती हैं. वे भी दूसरे नेताओं की तरह ही वायदे करते हैं. वे ग़रीब समर्थक मालूम देते हैं. उनसे पहले मायावती और मुलायम सिंह यादव भी यही लगते थे. इंदिरा गांधी ने भी ऐसा ही कहा था. अतीत में \'ग़रीबी हटाओ\' के नारे के लिए उन्हें खूब शोहरत मिली थी. केजरीवाल भी आम लोगों से संपर्क करते हैं, दूसरे नेता भी यही करते हैं. नरेंद्र मोदी अब जननेता हैं, क्या वे नहीं है? ऐसा करने वाले केजरीवाल न तो पहले नेता हैं और न आखिरी नेता होंगे. इसलिए वह और उनकी पार्टी किस तरह अलग हैं?\"

समर्थकों का विश्वास

रिपोर्टर को लगता है, \"आम आदमी पार्टी एक नए तरह की राजनीति है. यह जनता का आंदोलन है. यह भारतीय राजनीति में बदलाव की एजेंट है. दिल्ली के लोगों ने इसके अतीत की ग़लतियों को भुलाकर पूरे पांच साल के लिए ज़बर्दस्त बहुमत दिया है. लोगों को लगता है कि यह उनकी पार्टी है. इसके कार्यकर्ताओं को लगता है कि पार्टी में उनकी भागीदारी है.\"

(पढ़ेंः तो निकल गई मोदी के करिश्मे की हवा)

मन सोचता है, \"एक बार जीत की खुमारी उतर जाएगी तो लोग चुनावी वादों पर अमल किए जाने की मांग करेंगे. हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां जनता अपनी चाहतों को जल्द पूरा होते देखना चाहती है. सत्ता संभालने के पहले ही दिन से समर्थकों का विश्वास के टूटने का ख़तरा मंडराने लगता है. किसी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. मैं जानता हूं कि मैं जीत का मज़ा खराब करने वाली बातें कर रहा हूं लेकिन मैं एक व्यावहारिक आदमी हूं. मैं एक रिपोर्टर नहीं हूं. मैं किसी का पक्ष ले सकता हूं.\"

जनादेश का मोह

मैंने यह पिछले बरस भी देखा था जब मोदी एक तूफ़ानी बहुमत के साथ सत्ता में आए थे.

(पढ़ेंः कैसी होगी विपक्ष के बिना विधानसभा)

मैं अब उनकी चमक को फीका पड़ते देख रहा हूं. मोदी अब उसी महाजनादेश के मोह में जी रहे हैं.

मोदी और केजरीवाल से पहले मायावती के लिए भी जनता में कुछ इसी तरह की खुमारी देखी गई थी. तब वे पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थीं.

जब लालू यादव भी पहली बार बिहार में सत्ता में आए थे तो हर तरफ़ जश्न का माहौल था और अख़बार के पन्ने एक नई तरह की राजनीति की बातों से भर गए थे.

नई राजनीति

और राजीव गांधी भी पहाड़ जैसे बहुमत के साथ सत्ता में आए थे और पिछले बरस मोदी के चुने जाने के बाद एक नई सुबह की बात की गई थी.

(पढ़ेंः दिल्ली चुनाव पर विशेष कवरेज)

इसमें कोई शक नहीं कि केजरीवाल की सत्ता में वापसी बेहद प्रभावशाली रही है और यह उनकी कड़ी मेहनत और साफ़ छवि की वजह से ही हो पाया.

लेकिन निश्चित रूप से वो एक नई तरह की राजनीति नहीं हैं और न उनकी राजनीति एक नया सवेरा है.

बीमार व्यवस्था!

अरविंद केजरीवाल को मिला ये विशाल जनादेश किसी बदलाव की अगुवाई के लिए नहीं है और न एक नई सुबह के लिए.

(पढ़ेंः \'मोदी के लिए राजनीतिक भूकंप\')

यह एक बीमार व्यवस्था की परेशानियों को समझने और उन्हें दुरुस्त करने के लिए है और मुमकिन हो तो आम आदमी को न केवल चुनावी राजनीति में बल्कि सरकार के कामकाज में भी अपनी बात रखने का मौका मिले.

हार-जीत

रिपोर्टर कहता है, \"केजरीवाल के करिश्मे और लोगों को संगठित करने की काबिलियत को लोग मानते हैं. वे आम लोगों और समाज के हाशिये पर छूट गए लोगों के लिए राजनीति करते हैं.\"

भीतर से आवाज़ आती है, \"पुराने वक़्त में रोमन साम्राज्य के दिनों में समाज के ताकतवर लोगों और कामकाजी वर्ग और ग़रीब लोगों के बीच संघर्ष की स्थिति रहती थी. जब भी कोई एक जीतता था, उसकी जीत दूसरे की कीमत पर होती थी. दोनों की हार जीत लगी रहती थी. ये हार-जीत के सिलसिले की तरह था. एक तरफ़ केजरीवाल, मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और दूसरे नेता हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस और बीजेपी. दोनों ही पक्षों की हार-जीत लगी रहेगी. उम्मीद की लौ जलती-बुझती रहेगी, निराशा के बादल आते-जाते रहेंगे.\"

अब मैं अपने मन की और रिपोर्टर की बातों को विराम देता हूं सिर्फ दो शब्दों के साथ-लोकतंत्र ज़िंदाबाद.

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