टेक्नोलॉजी / भारत सहित कई देशों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को कर्मचारी सिखा रहे हुनर



Employees are teaching skills for artificial intelligence
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Employees are teaching skills for artificial intelligence

  • टेक्नोलॉजी मानवों से तो बहुत कुछ सीख रही है पर यह सिखाने वालों के लिए फायदेमंद नहीं
  • टेक्नोलॉजी कंपनियां एआई के निर्माण की प्रक्रिया का खुलासा नहीं करती हैं

Dainik Bhaskar

Aug 19, 2019, 11:52 AM IST

केड मेट्ज | भुवनेश्वर
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में नमिता प्रधान एक डेस्क पर बैठकर किसी अन्य देश के अस्पताल में रिकॉर्ड किए गए वीडियो को देख रही हैं। वीडियो किसी व्यक्ति की आंत का अंदरूनी हिस्सा दिखाता है। नमिता बड़ी आंत में एक छोटे से आकार की बढ़त (पोलिप्स) खोज रही हैं। इससे कैंसर हो सकता है। ऐसा पोलिप नजर आने पर वे उसके चारों तरफ घेरा बना देती हैं। वे डॉक्टर नहीं हैं लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम को सिखा रही हैं।


नमिता उन दर्जनों युवक, युवतियों में शामिल हैं जो चौथी मंजिल पर बने एक ऑफिस में डेस्क पर लाइन से बैठे हैं। वे सभी तरह की डिजिटल इमेज पहचानने के लिए प्रशिक्षित हैं। ट्रैफिक सिग्नल, सड़कों पर चल रहे राहगीरों और तेल टैंकरों के सैटेलाइट फोटो जैसी वस्तुओं को समझ सकते हैं। टेक इंडस्ट्री से जुड़े अधिकतर लोग बताएंगे कि इंडस्ट्री का भविष्य एआई है। लेकिन, टेक एक्जीक्यूटिव बहुत कम ही इसके निर्माण में लग रही मानवीय प्रक्रिया का जिक्र करते हैं। एआई मानवों से बहुत ज्यादा कुछ सीख रही है।


एआई सिस्टम के कुछ सीखने से पहले किसी को उसे सप्लाई किए जाने वाला डेटा को लेबल करना पड़ता है। उदाहरण के लिए मनुष्य ही पोलिप की पहचान बताते हैं। सेल्फ ड्राइविंग कारों, निगरानी सिस्टम और ऑटोमेटिक हेल्थ केयर जैसी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का निर्माण करने के लिए शुरुआती काम जरूरी है। टेक कंपनियां इस काम के बारे में चुप रहती हैं। मैंने इस वर्ष पांच ऑफिसों का जायजा लिया जहां लोग एआई सिस्टम को सिखाने के लिए बार-बार एक ही काम कर रहे हैं। ये ऑफिस आईमेरिट कंपनी के हैं। वहां नमिता प्रधान जैसे सर्वेयर और विशेषज्ञ हैं जो कम, ज्यादा सर्दी और सड़कों, ट्रैफिक के बारे में बताते हैं। इन दफ्तरों को कॉल सेंटर या पेमेंट प्रोसेसिंग सेंटर कह सकते हैं। ऐसा ही एक ऑफिस पश्चिम कोलकाता में है। नमिता ने ओकलैंड, कैलिफोर्निया स्थित एक डॉक्टर से ऑनलाइन वीडियो कॉल के जरिये सात दिन में अपना काम सीखा है।


भारत, चीन, नेपाल, फिलीपीन्स, पूर्व अफ्रीका और अमेरिका के कई शहरों में स्थित दफ्तरों में हजारों लोग मशीनों को सिखा रहे हैं। हजारों कामगार, स्वतंत्र कॉन्ट्रेक्टर अपने घरों से अमेजन मैकेनिकल टर्क जैसी क्राउडसोर्सिंग सेवाओं के माध्यम से डेटा को पहचान रहे हैं। उसकी व्याख्या कर रहे हैं। कामगारों को हर लेबल के लिए गिने-चुने पैसे मिलते हैं। भारत स्थित आईमैरिट कंपनी टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की कई बड़ी कंपनियों के लिए डेटा लेबल करती है। उसने गोपनीयता का हवाला देकर अपने क्लाइंट के नाम बताने से इनकार कर दिया।


पांच वर्ष में 85 अरब रु. का होगा डेटा पहचान का बाजार 
कोई नहीं जानता कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कब जॉब मार्केट को खोखला कर देगा। फिलहाल इससे कम वेतन वाले जॉब निकल रहे हैं। 2018 में डेटा लेबलिंग मार्केट 3557 करोड़ रुपए का था। रिसर्च फर्म कॉग्निलिटिका के अनुसार यह 2023 तक 85 अरब रुपए से अधिक हो जाएगा। अध्ययन से पता लगा है, इस तरह के काम में 80% समय एआई टेक्नोलॉजी बनाने में लग जाता है। 

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