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कोई देश, थानेदार तभी बनता है जब इस पुलिस कर्म में उसका हित हो

6 महीने पहलेलेखक: नवनीत गुर्जर
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प्रतीकात्मक फोटो।
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ऐसा क़तई नहीं होना चाहिए कि शांति युग का सूत्रपात करने वाली यह दुनिया देखती रह जाए और दो राष्ट्राध्यक्षों की जिद या स्वार्थ अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचकर एक महायुद्ध में परिणत हो जाए। जैसा खाड़ी युद्ध के समय हुआ था। हालांकि, वह युद्ध भी अपने समय से पचास साल पहले तक का सबसे पूर्व सूचित, पूर्व विज्ञापित युद्ध था जिसे अधिकतम पूर्व तैयारियों के साथ लड़ा गया था। हुआ यूं था कि इराक़ ने अचानक कुवैत पर धावा बोलकर उसे दबोच लिया था। अमेरिका को तब लगा था कि इराक़ ने कुवैत नहीं, जॉर्ज बुश की नाक पकड़ ली है। तब से सवा पांच महीने गुज़र गए थे और कोई यह नहीं कह सकता था कि सद्दाम हुसैन या जॉर्ज बुश या सऊदी अरब के शासकों के पास हिसाब लगाने का वक़्त नहीं था कि लड़ाई संक्षिप्त होगी या लंबी, भयानक होगी या आसान, मशीनी संहार के बाद सन्नाटा कम करने वाली होगी या आंसुओं की नदी के बीच इंसानी संकल्प की परीक्षा लेने वाली होगी? सितंबर 1939 में पोलैंड पर हिटलर के हमले के बाद जब ब्रिटेन ने युद्ध की औपचारिक घोषणा की, तब भी एकदम लड़ाई शुरू नहीं हुई थी। तब भी युद्ध की तैयारी करते ऐसे ही महीने गुज़रे थे, जैसे खाड़ी युद्ध के दौरान अरब के रेगिस्तान में बीते थे। उसे फोनी वॉर या झूठमूठ की लड़ाई कहा गया था, लेकिन पचास साल बाद खाड़ी युद्ध की घोषणा किसी ने नहीं की थी। उल्टे युद्ध टालने के प्रयास दिन- रात किए गए। महाभारत टालने के लिए जिस तरह अंतिम मध्यस्थता करने कृष्ण हस्तिनापुर गए थे और सूई की नोक बराबर ज़मीन न देने का टका सा जवाब लेकर लौट आए थे, उसी तरह खाड़ी युद्ध से पहले भी बेकर बग़दाद जाकर लौट आए थे। पेरेज द कुइयार भी निराश लौट आए थे, युद्ध तभी शुरू हुआ था। ईरान और अमेरिका के बीच फ़िलहाल युद्ध की आशंका है, लेकिन होगा ही, यह अभी से कहा नहीं जा सकता। क्योंकि ईरान की सेना भले ही उतनी ताकतवर न हो, लेकिन अमेरिका सहित सब जानते हैं कि दुनिया का एक तिहाई तेल मध्य पूर्व में ही है और इस तेल की ताकत को कोई भी देश अमान्य नहीं कर सकता। जो भी होगा, समझौते के ज़रिये ही होगा। इस समझौते में भले ही अमेरिका को तेल फ़ायदा हो जाए, लेकिन युद्ध मुमकिन नहीं लगता। जैसे किसी ज़माने में जापान ने मंचूरिया पर, इटली ने एबीसीनिया पर और जर्मनी ने ऑस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया पर हमला करके उन्हें दबोच लिया था, उसी तरह अमेरिका भी ईरान को दबोच लेगा और शीत युद्ध के दिनों में प्राय: असहाय रहने वाला संयुक्त राष्ट्र संघ इस बार भी पुरानी लीग ऑफ़ नेशंस की तरह छटपटाता रहेगा। ऐसा अब संभव नहीं है। खैर, अरब के रेगिस्तान में लाखों अमेरिकी सिपाही किसी हवाई सिद्धांत की रक्षा के लिए मौजूद नहीं हैं, जैसे एफ़आईआर लिखाने के बाद पुलिस जाती है। वे इसलिए वहां हैं, क्योंकि अमेरिका के बुनियादी राष्ट्रीय स्वार्थ तेल के साथ जुड़े हुए हैं। दुनिया का सबसे ताक़तवर देश, संसार का पुलिसवाला तभी बनता है, जब इस पुलिस कर्म में उसका अपना भी हित हो।

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