बंदिशों से परे / अच्छे काम की प्रशंसा से बढ़ता है नया करने का हौसला



प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2019, 12:11 AM IST

डॉ जयंत नार्लीकर. कोल्हापुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में 1938 में मेरा जन्म हुआ। मेरे दादाजी वासुदेव शास्त्री संस्कृत के विद्वान थे। मेरे पिता गणितज्ञ थे व हायर एजुकेशन के लिए 1928 से 32 तक कैम्ब्रिज विश्वविद्याल में पढ़े थे। ब्रिटिश काल में रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के ‘रोल ऑफ ऑनर’ पर आज भी उनका नाम लिखा हुआ है। उन्हें देश से बहुत प्यार था, इसलिए सभी प्रलोभन छोड़कर वे लौट आए और बनारस विवि में गणितज्ञ हो गए।

 

तब वे 24 वर्ष के थे। कैम्ब्रिज जाने के लिए कोल्हापुर में पिताजी ने जो कर्ज लिया था, बीएचयू के संस्थापक पं. मदन मोहन मालवीय ने वह सब चुका दिया। पिता बाद में बीएचयू में वाइस चांसलर और फिर राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे। यह मेरा सौभाग्य था कि मैं विद्वान लोगों के घर में पैदा हुआ, शायद इसलिए साधारण सा स्टूडेंट होकर भी मैं कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी तक पहुंच गया। मेरा पूरा बचपन बनारस में बीता, वहीं हिंदू विवि से स्नातक होकर जब शिक्षा और अनुसंधान के लिए कैम्ब्रिज रवाना हुआ, तब मैं 19 वर्ष का था। वहीं पर सैद्धांतिक खगोल भौतिकी में मेरी दिलचस्पी बढ़ी।

 

मैं सोचता हूं कि मेरी मां सुमति और दादी भी उच्च शिक्षित थीं, इसलिए मुझे अच्छे संस्कार मिले। परिवार के सभी सदस्य, रिश्तेदार पढ़े-लिखे थे और मेरे बेहतरीन दोस्त साबित हुए। शायद इसलिए मेरी जीवनयात्रा आसान हो गई। जिस घर में शिक्षा का माहौल होता है, उस घर के बच्चों को पढ़ने के लिए बार-बार टोकना नहीं पड़ता। इतना सब बताने का मेरा उद्देश्य यही है कि शिक्षा हर किसी के लिए कितनी जरूरी है। आपके उच्च शिक्षित और संस्कारी होने का असर यह होता है कि आपके परिवार में उसकी चेन बनती चली जाती है। ऐसे ही समाज में जब चेन बनने लगेगी तो देश की उन्नति में बाधा नहीं आएगी।


मैंने इंटर में टॉप किया था, इसलिए सभी विकल्प खुले थे। अधिकांश छात्र इंजीनियरिंग में चले गए। मैंने गणित और भौतिक शास्त्र चुना और खगोल विज्ञान में अनुसंधान करने का मन बनाया। स्कूली जीवन का एक वाकया बताना चाहता हूं- उस समय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में मैट्रिक परीक्षा को प्रवेश परीक्षा कहा जाता था। तब हिंदी में किसी को भी डिस्टिंग्शन देने का चलन नहीं था। 100 में से 25 अंक बाजू में रखकर ही परीक्षक पेपर जांचता था। सभी को मुझसे हाईस्कोर की उम्मीद थी। मैं 1000 में से 805 अंक हासिल कर प्रथम आया।

 

मुझे हिंदी, संस्कृत और गणित में विशेष योग्यता मिली, वह रिकॉर्ड अभी तक किसी ने नहीं तोड़ा है, जबकि मैं अहिंदी भाषी छात्र था। जब सभी ओर मेरी तारीफ होने लगी तो हौसला बहुत बढ़ गया। अपने 80 वर्ष से ज्यादा के अनुभव से यह कहना चाहता हूं कि कोई अच्छा काम कर रहा है तो उसकी तारीफ करने में आप संकोच न करें। आपके द्वारा की गई तारीफ ही सामने वाले को और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। मुझे शुरू से गणित पसंद था, बाद में मुझे विज्ञान भी पसंद आने लगा।

 

हमारे घर में दो दीवारों पर ब्लैकबोर्ड टंगे होते थे, जिन पर पिता व भाई मनोरंजक तरीके से गणित और विज्ञान के बारे में लिखते रहते थे। हमें बोर्ड पर तब तक लिखते रहना होता था, जब तक हम कोई सूत्र या सवाल नए तरीके से हल नहीं कर लेते थे। मेरा अनुभव कहता है कि हर घर में बच्चों के बड़े होने तक ब्लैकबोर्ड रखना चाहिए। यह जरूरी बातें नोट करने में, पढ़ाई में बहुत मदद करता है।


फ्रेड होयल-नार्लीकर सिद्धांत: मैंने कैम्ब्रिज में विश्वविख्यात नक्षत्र विज्ञानी प्रो. फ्रेड होयल के निर्देशन में गुरुत्वाकर्षण एवं कॉस्मोलोजी पर नए अनुसंधान किए। इसे आगे चलकर फ्रेड होयल-नार्लीकर सिद्धांत कहा जाने लगा। इसमें हमने बताया कि पृथ्वी और ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई। कई नए अनुसंधानों पर शोध करके मैंने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। लोग मुझे ब्रह्मांड की स्थिर अवस्था के सिद्धांत का विशेषज्ञ बुलाने लगे। साथ ही भौतिकी के फ्रेड होयल-नार्लीकर सिद्धांत का जनक भी कहने लगे। विज्ञान को आम जीवन में उपयोगी बनाने के लिए विज्ञान के अलग-अलग सिद्धांतों पर आधारित कई भाषाओं में अनेक पुस्तकें लिखीं।

 

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हमने आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत और मानक सिद्धांत को मिलाते हुए होयल-नार्लीकर सिद्धांत बनाया। मेरे द्वारा प्रतिपादित गुरुत्वाकर्षण के नए सिद्धांत एवं कॉस्मोलोजी संबंधी अनुसंधान के लिए कैम्ब्रिज विवि ने मुझे एडम पुरस्कार से सम्मानित किया। 30 वर्ष की आयु में यह पुरस्कार पाने वाला मैं चौथा भारतीय था। किसी भारतीय के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। मुझसे पहले डॉ. होमी जहांगीर भाभा, डॉ. एस. चंद्रशेखर व डॉ. बी.एस. हुजूबार यह पुरस्कार पा चुके हैं। जब 1964 में मुझे पद्मभूषण से अलंकृत किया गया तो लगा पूरे देश का प्यार मुझे मिल गया है।

 

देश-विदेश में मेरे छात्रों के रूप में बहुत बड़ा परिवार है, जो नए-नए विषयों पर अनुसंधान करने के लिए मुझसे संपर्क करते रहते हैं। यकीन मानिए मैं आज भी इन बच्चों से कुछ न कुछ सीखता रहता हूं। मुझे एक ही कमी लगती है कि एक जीवन अनुसंधान करने के लिए यह कम है।

 

नार्लीकर, इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनामी एंड एस्ट्रोफिजिक्स के संस्थापक-निदेशक रहे। कॉस्मोनोलॉजी कमीशन ऑफ़ इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के पूर्व अध्यक्ष नार्लीकर ब्रह्मांड विज्ञान में अपने काम के लिए जाने जाते हैं। वर्तमान में अन्तर्विश्वविद्यालयीन खगोलशास्त्र तथा खगोल-भौतिक केंद्र, पुणे के संचालक हैं। (जैसा उन्होंने दिव्य मराठी की जयश्री बोकिल को बताया)

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