अस्तित्व / आपकी यादों का डिब्बा फुल तो है ना?



astitva article: box of your memories is full, right?
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astitva article: box of your memories is full, right?

Dainik Bhaskar

Jul 13, 2019, 12:04 AM IST

फैमिली फंक्शन हो, दोस्तों का गैट-टु-गैदर या पति, बच्चों के साथ साल में एक बार मिलने वाली हिल स्टेशन की छुटि्टयां। क्या आपकी आदत में घर लौटने से पहले अपने फोन की मैमोरी फोटो और वीडियोज़ से भर लेने की है? क्या आप भी उन पलों को तस्वीरों के जरिए यादों के डिब्बे में कैद कर लेना चाहती हैं?

 

क्या आप भी हर दूसरी फुर्सतों पर अपनी फोटो गैलरी खोल उससे जमकर बतियाती हैं। उंगली से फोन पर तस्वीरें पलटाते क्या आपकी भी आंखें कभी खुशी तो कभी गम से पनीली हो जाती हैं। तो समझ लीजिए आपकी यादों का डिब्बा हमेशा फुल रहने वाला है। आप उन लोगों की कैटेगरी में आती हैं जो अपने होने की अहमियत के लिए बीत गए समय को सबूतों के साथ लेकर चलना पसंद करते हैं।

 

फिर वह सबूत चाहे मटैरियलिस्टिक हों या सिर्फ एहसास और अनुभवों में गढ़े हुए। यादों को दोनों अंजुलियों में बटोरने वाले ये वे लोग हैं जो पिछली तीन दीपावली से दादाजी की आरामकुर्सी को कबाड़ी वाले को देने निकालते हैं और फिर हर बार उसे वापस स्टोररूम में रख आते हैं। एहसासों की जमाखोरी के अपराधी वो भी हैं जो गिफ्ट से लिपटे रैपर्स को हौले-हौले निकालते हैं और उसे दराज में संभालकर रख देते हैं।

 

फिर याद तो किसी भी चीज की नातेदार हो ही सकती है। उस पर क्या किसी का जोर चला है? फिर देखा जाए तो ये यादें मिलती भी तो मुफ्त हैं। इनके बहुतायत जमा करने पर भी जेब उफ तक नहीं करती। लेकिन छंटाई को कहा जाए तो यही एक-एक याद कीमती हो जाती है। एक बार जरा अपनी यादों के डिब्बे पर नज़र तो दौड़ाना। वो अधखुला डिब्बा फुल है या उसमें अभी जगह बाकी है?

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