बंदिशों से परे / धारणाएं तोड़ने, छोटे कदम उठाने से मिली कामयाबी

तापसी पन्नू, अभिनेत्री तापसी पन्नू, अभिनेत्री
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तापसी पन्नू, अभिनेत्रीतापसी पन्नू, अभिनेत्री

  • अकेले अपनी राह खोजी, जोखिम लेकर बिज़नेस शुरू किए

दैनिक भास्कर

Sep 16, 2019, 02:50 AM IST

हर व्यक्ति के जीवन में संघर्ष होता है। समाज की रूढ़ियों से संघर्ष, खुद के भीतर बने मेंटल ब्लॉक से संघर्ष, परिस्थितियों से संघर्ष, घर-परिवार की परम्पराओं-धारणाओं से संघर्ष। मेरा मानना है कि संघर्ष भौतिक स्तर पर ही नहीं होता और कई बार आस-पास की भौतिक परिस्थितियों को मात देकर सफलता प्राप्त करना उतना कठिन नहीं होता, जितना मानसिक स्तर पर साहस दिखाना। मुझे इसी स्तर पर संघर्ष का सामना करना पड़ा है। सातवीं-आठवीं क्लास तक गणित अच्छा नहीं लगता था, लेकिन पिताजी ने कहा कि गणित से प्यार करना सीख लो, क्योंकि गणित ज़िंदगी भर तुमसे चिपका रहेगा। मैंने गणित को समझना शुरू किया। फिर तो यह मेरा पसंदीदा विषय बन गया। जबकि हमारे दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि लड़कियां गणित नहीं पढ़ सकती। मेरी आदत रही है कि मुझे जिस चीज़ से डर लगे या मना किया जाए मैं वो ज़रूर करती हूं। तो पहला संघर्ष धारणा से और पहली जीत भी उसी पर।


मुझे याद है, मुझे व मेरी बहन को शाम को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। मुझे लगता था कि आखिर मैंने क्या गुनाह किया है कि मुझे घर से नहीं निकलने दिया जाता। जहां शाम को मुझे घर से निकलने नहीं दिया जाता था वहीं 21 साल की उम्र मुझे अकेले दिल्ली से बाहर हैदराबाद जाना पड़ा और मैं गई। मुझे एक फिल्म मिली थी। वहां मैंने अकेले कमरा ढूंढ़ा, सामान खरीदा, घर का सामान जुटाया। यह थी दूसरी धारणा पर जीत। मेरे कॉलेज टाइम में मुझे डांस का बहुत शौक था, लेकिन कोई टीम नहीं बन रही थी। जब कुछ नहीं दिखा तो मैंने खुद अपनी ऑल वर्ल्ड गर्ल्स डांस टीम बनाई। मैं अपने घर से पॉकेट मनी लिया करती थी। घर में पॉकेट मनी का हिसाब देने का नियम था। मुझे यह बहुत खराब लगता था। मैं चाहती थी कि मैं खुद कमाना शुरू करूं ताकि मुझे हिसाब न देना पड़े, इसलिए मैंने मॉडलिंग शुरू की। मॉडलिंग कोई मेरे लिए कॅरिअर नहीं थी। मुझे घर से बाहर रहने या कहीं भी देर रात जाने की इजाज़त नहीं थीं। मुझे इस लाइन में आना भी नहीं था। लेकिन मॉडलिंग मेरे लिए एक पार्ट टाइम ज़ॉब थी। तीसरा कदम था अपनी राह खुद बनाने की, आत्म-निर्भर होने का।


मेरे पिताजी ने कभी बिज़नेस नहीं किया था। वे रीअल एस्टेट कंपनी में फाइनेन्स संभालते थे, लेकिन मैंने दो बिज़नेस शुरू किए हैं। दोनों सफलतापूर्वक चल रहे हैं। एक वैडिंग प्लानिंग का बिज़नेस है- द वैडिंग फैक्ट्री नाम से। इसके बाद मैंने पुणे की बैडमिंटन लीग की टीम खरीदी है। मैंने सब कुछ बहुत छोटी-छोटी योजना से शुरू किया। हर लेवल पर खुद को छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ाया। अपने डर को जीता। नाकाम होने का होने का जोखिम लेने का साहस मेरी अगली कामयाबी रही। जोखिम लेने के लिए आत्मविश्वास होना ज़रूरी है। सेफ गेम खेलने में मज़ा नहीं आता। मेरे लिए फिल्म इंडस्ट्री में आना भी जोखिम था। जोखिम लेते समय हमें यह सोच रखनी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाएगा? हम फेल ही तो हो जाएंगे न...पैसे बर्बाद हो जाएंगे, मर थोड़ी जाएंगे, ज़िंदा रह गए तो दोबारा करेंगे। अंग्रेज़ी की एक कहावत है कि व्हॉट डज़ नॉट किल यू मेक्स यू...।  कुछ भी स्थायी नहीं है, अच्छा और खराब वक्त दोनों। किंतु नकारात्मकता हमें आकर्षित करती है। जो हमारे पास नहीं है हमें वो याद रहता है, लेकिन जो है वो याद नहीं रहता है। हमें अच्छी बातें और अच्छी चीज़ें याद नहीं रहती हैं। वक्त बर्बाद हो रहा है निगेटिव सोचने में। पॉज़िटिविटी से ही चीज़ें बेहतर होती हैं।


मिशन मंगल फिल्म करते हुए और सांइस स्टूडेंट होने के नाते मैं कह सकती हूं कि लड़कियां किसी स्तर पर कम नहीं हैं। महिलाओं को अगर कुछ रोकता है तो वह है उनका अंडर-कॉन्फिडेंस। वह कैसे कुछ और नहीं कर सकती है, जबकि वह दुनिया में दूसरी ज़िंदगी लाती है।  मौजूदा वक्त महिलाओं को तरक्की करने के लिए काफी पॉज़िटिव है। मैं अगर अपनी मां के दौर की बात करूं तो अब वक्त काफी बदल चुका है। मैं वर्ष 2010 में फिल्म इंडस्ट्री में आई थी। मैं देख रही हूं कि तब से लेकर आज तक हर फील्ड में चीज़ें बदली हैं। हालांकि यह काफी नहीं है। महिलाओं में हिम्मत आई है। उन्होंने बात करना शुरू किया है। हर स्तर पर कम से कम थोड़ा ही सही लेकिन कहीं कुछ तो शुरू हुआ। पुरानी जड़ हो चुकी दीवारें गिर रही हैं। बेशक यह सब अभी बहुत धीमा है। यह किस रफ्तार से बढ़ता है यह देखना है। 


दरअसल, महिलाओं के रास्ते की दीवारों को महिलाओं की आर्थिक आज़ादी, आत्म-निर्भरता और आत्म-विश्वास ही गिरा सकता है। तभी वे अपनी ज़िंदगी की बागडोर अपने हाथ में रख सकेंगी। ज्यादातर महिलाएं सोचती हैं कि क्यों बोलें? बोलूंगी तो घर में कलह होगी, कहां जाऊंगी, कौन मदद करेगा । वे बोलना तो चाहती हैं, लेकिन बोलती नहीं हैं क्योंकि उनके पास कोई ऑप्शन नहीं होता है। मुझे याद है मेरी मां ने मुझे बचपन से ही सिखाया है कि एक चुप सौ सुख, वह अभी भी ऐसा ही बोलती हैं। मुझे ‘एक चुप सौ सुख’ का कॉन्सेप्ट इरिटेट करता है। क्यों महिलाएं कोई सवाल नहीं पूछ सकती हैं। उन्हें बस यह लगता है कि वे चुप रहेंगी तो सब ठीक रहेगा। 

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