जीने की राह / निंदा हो तो दूरदर्शी और सहनशील हो जाएं

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jan 16, 2020, 12:25 AM IST

अपनी निंदा सुनकर समझदार से समझदार व्यक्ति भी विचलित हो जाता है। कुछ लोग अपनी बेचैनी बाहर प्रकट कर देते हैं और कुछ छुपाकर रख लेते हैं, पर निंदा अच्छे-अच्छों को विचलित कर जाती है। अब ऐसी व्यवस्था तो नहीं हो सकती कि आपकी कोई निंदा करे ही नहीं। इस संसार में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, ईर्ष्या जिनका स्वभाव है।

आप उनके लिए कितना ही अच्छा कर लें, वो तो ईर्ष्या करेंगे ही और ईर्ष्या करने वालों का सबसे अच्छा हथियार होता है निंदा। अब, यदि सामने वाले ने हथियार उठा ही रखा है तो युद्ध तो आपको भी करना पड़ेगा। निंदा से युद्ध का मतलब पलटकर जवाब देना नहीं होता। यह एक ऐसा युद्ध है जो सुरक्षा से लड़ा जाता है, आक्रमण से नहीं। तो निंदा के प्रति सबसे अच्छा आक्रमण या बचाव है कि हम पर कोई असर न हो।

हम उस निंदा के तथ्य पर न जाकर सत्य पर टिकें। तथ्य गलत हो सकते हैं, सत्य गलत नहीं होता। कुछ बातों के तथ्य स्थापित हो जाते हैं तो लोग उसे ही सत्य मानने लगते हैं। जैसे एक लोककथा में बताया जाता है कि बंदर तैरना नहीं जानता था तो घड़ियाल की पीठ पर बैठ गया। लेकिन ऐसा है नहीं..।

बंदर भी तैर सकता है, पर कथा में स्थापित हुआ तो लोग आज तक मानते हैं कि बंदर को तैरना नहीं आता। ऐसे ही जब कोई हमारी निंदा करे तो उसके तथ्य को मत पकड़िए। जब-जब निंदा हो, दूरदर्शी हो जाएं, सहनशील हो जाएं। ये दो बातें आपको निंदा के आक्रमण से बचा लेंगी..।

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