खुली बात / जलवायु परिवर्तन से बच्चों पर सर्वाधिक असर

Children are most affected by climate change
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Children are most affected by climate change

दैनिक भास्कर

Dec 03, 2019, 01:08 AM IST

( सीमा जावेद- पर्यावरणविद, स्वतंत्र पत्रकार )

प्रमुख मेडिकल जर्नल लांसेट ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर के बारे में खुलासा किया है। लांसेट ने 41 पहलुओं को ध्यान में रखकर लिखी रिपोर्ट में बताया है कि किस तरह से जलवायु में बदलाव और वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियां बच्चों के लिए घातक हैं। रिपोर्ट बताती है कि लंबे संघर्ष के बाद तीसरे दुनिया के देशों को कुपोषण और संक्रामक बीमारियों के खिलाफ मिली थोड़ी-बहुत कामयाबी को क्लाइमेट चेंज मिट्टी में मिला देगा। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनियाभर में 9-10 साल के बच्चों में वर्ष 2000 से डेंगू बुखार का पैटर्न बढ़ रहा है। डायरिया जैसी बीमारियां दोगुनी हो गई हैं। ज़ाहिर है कि बढ़ती उम्र में अपने विकास के दौरान बच्चों का इम्यून सिस्टम कमज़ोर होता है, जो संक्रामक रोगों से लड़ने के लिए पूरी तरह मज़बूत नहीं होता। ऐसे में बढ़ते संक्रामक रोगों की वृद्धि से बच्चे सबसे अधिक पीड़ित होंगे। 


गौरतलब है कि हैजा के लिए ज़िम्मेदार विब्रियो बैक्टीरिया के बढ़ते तापमान के साथ और अधिक पनपने के कारण 1980 के दशक से भारत में प्रत्येक वर्ष 3% की दर से हैजा की बीमारी बढ़ रही है। बदलती जलवायु में डायरिया या हैजे जैसी बीमारियों के बैक्टीरिया आसानी से पनप रहे हैं और ज़िन्दा रहते हैं। ठंडे देशों के लोग भी अब गर्म देशों के इन रोगों से दो-चार होने को मजबूर हैं।
भारत के मामले में साफ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही सूखे की घटनाओं से महंगाई बच्चों के पोषण के लिए एक समस्या बन रही है। उनको अनाज मिलने में मुश्किल हो रही है। महत्वपूर्ण है कि 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कुल मौतों में दो-तिहाई कुपोषण के कारण होती हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि किशोरावस्था के दौरान प्रदूषण का सेहत पर अधिक प्रभाव बढ़ता है।

जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर भी इस रिपोर्ट में चिंता जताई गई है और कहा गया है कि जंगलों का जलना वायु प्रदूषण के साथ-साथ तापमान वृद्धि में बड़ी भूमिका अदा करता है।
पेरिस समझौते के वादों के मुताबिक अगर दुनिया के देश धरती की तापमान-वृद्धि 2 डिग्री से कम रखने में कामयाब होते हैं तो आज पैदा होने वाला बच्चा 31 साल की उम्र में कार्बन न्यूट्रल दुनिया में सांस लेगा, लेकिन बदकिस्मती यह है कि वर्तमान हालात में ऐसा होता नहीं दिख रहा। दुनिया ने पूर्व-औद्योगिक काल के बाद 1 डिग्री तापमान की वृद्धि देखी है। पिछले दशक में दस में से आठ वर्ष सबसे गर्म वर्षों में गिने गए जो कि एक रिकॉर्ड है। परिणामस्वरूप उत्तर-पश्चिम कनाडा के तापमान में 3 डिग्री की आश्चर्यजनक वृद्धि दर्ज हुई है। इतनी तेजी से परिवर्तन का मुख्य कारण है तेजी से हो रहे जीवाश्म ईंधन का दहन। उल्लेखनीय है कि हम हर सेकंड  करीब 1,71,000 किलोग्राम कोयला,  11,600,000 लीटर गैस और 1,86,000 लीटर तेल जला रहे हैं। जब तक हम जीवाश्म ईंधन के दहन को पूरी तरह नहीं रोकते, तब तक इन मुसीबतों से निजात का रास्ता नहीं निकलेगा।


रिपोर्ट हर महाद्वीप से 35 प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के निष्कर्षों और आम सहमति को प्रस्तुत करती है। जो काफी हद तक दर्शाता है कि इस गर्म होती दुनिया के लिए हम कितने गंभीर हैं और इसको लेकर क्रियाशील या निष्क्रिय है। कार्यान्वित की गई नीतियों को इन संभावित स्थितियों में निर्धारित करने से दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। 


अब हमें दो रास्तों में से एक को चुनना होगा। एक है ‘सब इसी तरह चलता है’ की राह और दूसरा जो ‘तापमान 2 डिग्री से नीचे रखने’ के प्रभाव को पहचानने में मदद करता है। हम कौन सी राह चुनते हैं, इससे ही निर्धारित होगा कि हम अपनी भावी पीढ़ी को क्या देना चाहते हैं? एक दमघोंटू वातावरण, जिसमें वह साँस भी न ले सके या फिर एक हराभरा कल। फैसला हमारे हाथ में है। हम अपने बच्चों से यह कहते हैं कि हम तुम्हारे लिए जी रहे हैं पर सच यह है हममें से कोई भी इस बात को लेकर चिंतित नहीं है कि आज सांस लेने के लिए साफ़ हवा भी नहीं बची है। साफ खाना-पानी तो दूर की बात है, ऐसे में हम उनको किसी सुनहरे कल का सपना भी दिखने में असमर्थ हैं ।  

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