सुर्खियों से आगे / बच्चों को सिखाना होगा-उजाला तो बनाया जा सकता है, पर धूप नहीं

आनंद पांडेय

आनंद पांडेय

Dec 12, 2019, 01:39 AM IST

क्या आज के बच्चे नंबर लाने के चक्कर में जिंदगी के झंझावातों से लड़ना और जूझना भूल गए हैं? संसद में हाल में पेश किए दो आंकड़े तो यही चुगली कर रहे हैं। पहला आंकड़ा, आईआईटी-आईआईएम मेें पढ़ने वाले बच्चों की खुदकुशी का है।

दूसरा आंकड़ा- आईआईटी-ट्रिपल आईटी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले बच्चों का। पिछले पांच सालों में देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान माने जाने वाले आईआईटी-आईआईएम के साठ विद्यार्थी खुदकुशी कर चुके हैं। यानी हर महीने-एक प्रतिभाशाली जवान मौत। हो सकता है अंकगणित के पैरामीटर में ये आंकडा छोटा दिखाई पड़ रहा हो… तो एक नजर देशभर में विद्यार्थियों के खुदकुशी के कुल आंकड़ों पर भी डाल लेते हैं।

2014 से 2016 सिर्फ तीन सालों में ही देशभर में (सभी स्कूल-कॉलेज मिलाकर) लगभग 26 हजार विद्यार्थियों ने खुदकुशी की। लगभग हर घंटे में एक अकाल मौत हुई है। उधर पिछले पांच सालों में ही सात हजार बच्चों ने आईआईटी और ट्रिपल आईटी की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी।  


हालांकि बच्चों की खुदकुशी के लिए खुद बच्चे नहीं, बड़े जिम्मेदार हैं। बड़ों ने बच्चों के उर्वर मस्तिष्क को सिर्फ नंबर उगलने वाली मशीन मान लिया है। जितने अच्छे नंबर, उतनी बढ़िया मशीन। उन्हें समझा दिया गया है कि जिंदगी में चाहे जो कुछ भी हासिल करना हो, उसकी बुनियाद में रहेगी तो मार्कशीट ही। बच्चे भी जानते हैं कि प्रतिभा विरासत में नहीं मिलती है.. सो वो भी खून को पानी बना देने वाली हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं।

सौ में से सौ अंक लाते हैंं। लेकिन बीच सफर में ही लड़ते-लड़ते थक जाते हैं और पलायन का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। अधिकांश बार देखने में आता है कि सपने तो मां-बाप के होते हैं, बच्चे तो मजबूरीवश उनमें रंग भरते हैं। बस यहीं से असहनीय तनाव शुरू होता है, जिसकी परिणति खुदकुशी की शक्ल में सामने आती है। हमें इन बच्चों को… और असल में तो बच्चों से ज्यादा बड़ों को शुक्रनीति का श्लोक- अमत्रं अक्षरं नास्ति, नास्ति मूलं अनौषधं… समझाना होगा। जिसका सरल भाषा में अर्थ है कि सर्वशक्तिमान क्रिएचर कचरा (गार्बेज) क्रिएट नहीं करता है।

वो हर इंसान को किसी न किसी काबिलियत और हुनर से जरूर नवाजता है। बस जरूरत होती है उस हुनर को पहचानने और निखारने की। बच्चों को बताना होगा कि वो बाय डिफाल्ट (नैसर्गिक) जो हैं उसी पर फोकस करें, बजाय मां-बाप के या पिअर प्रेशर में आकर बाय डिजाइन (कृत्रिम) कुछ अलग करने के। इस भयावह त्रासदी से बचने के लिए हमें परिवार के बीच होने वाला अपनापन लिया ममत्व का अनोखा-अद्भुत संवाद भी अपनाना होगा।

हमें अपने आप से पूछना होगा कि हमने आखिरी बार कब अपने बच्चों से इस तरह का बिना नंबर वाला संवाद किया था?  हाल ही में इंदौर में एक संस्था ने एक कार्यक्रम किया। विषय था- गूंगे हो रहे घर। वक्ता ने कहा कि आज के बच्चे पेरेंट-हंगर से जूझ रहे हैं। यानी हम समझ सब रहे हैं, लेकिन जितना करना चाहिए उतना कर नहीं रहे हैं। अपनी प्रतिभा और मां-बाप की जिद का घोल पीकर बेहद प्रतिष्ठित संस्थानों में जगह बनाने वाले बच्चे बीच में ही पढ़ाई भी छोड़ रहे हैं।

उन्हें लग रहा है कि जिस तरह परीक्षाओं के प्रश्न-पत्र एक से होते हैं, वैसे ही असल जिंदगी के प्रश्न-पत्र भी एक समान ही होते होंंगे। उन्हें समझाना होगा कि जिंदगी की परीक्षा में सभी का सिलेबस भले ही एकसामन हो, लेकिन प्रश्न-पत्र सबका अलग-अलग होता है। इसीलिए नकल का भी कोई फायदा नहीं मिलता। साथ ही बच्चों को ये भी सिखाना होगा कि पढ़ाई से नंबर तो हासिल किए जा सकते हैं, लेकिन जिंदगी से जूझने की काबिलियत नहीं। ठीक वैसे ही जैसे उजाला तो बनाया जा सकता है, लेकिन धूप नहीं।

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