विवाद / कोरोना की तरह प्रधानमंत्री अगले महीने से शुरू हो रहे राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को भी गंभीरता से लें

दैनिक भास्कर

Mar 21, 2020, 01:07 AM IST

जो सरकार एक महामारी से निपटने के प्रयास में लगी है, वही सरकार बैठे-बिठाए एक दूसरी महामारी की शुरुआत क्यों कर रही है? कोरोना की महामारी विदेश से आई है। प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश से इस मामले में सरकार की गंभीरता झलकती है। कम से कम अब तक भारत सरकार ने इस समस्या को समझदारी से निपटा है। आशा करनी चाहिए कि हम चीन या इटली जैसी हालत से बच जाएंगे। लेकिन, वही सरकार नागरिकता के मामले में पूरे देश को एक बेवजह मानव निर्मित महामारी में क्यों धकेल रही है? अब कुछ ही दिन में अप्रैल महीने से देशभर में एनपीआर यानी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। एनपीआर शुरू होने का मतलब है, नागरिकता के नए निज़ाम का आरंभ, जिसमें एनपीआर के साथ-साथ एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून भी शामिल हैं। इस मुद्दे पर देशभर में आशंका है, अनिश्चय है और असमंजस भी है। 

इस बार जनगणना अप्रैल 2020 से फरवरी 2021 के बीच होगी। जनगणना में हर परिवार से वो सवाल पूछे जाते हैं जो सरकार की नीति के लिए अनिवार्य होते हैं। लेकिन, इस बार केंद्र ने चालाकी से जनगणना वाले फॉर्म के साथ एनपीआर का एक और फॉर्म जोड़ दिया है। इसमें परिवार के लोगों के ब्योरे के अलावा हर व्यक्ति से उसके मां-बाप के जन्मदिन, जन्मस्थान और आधार व पैन नंबर आदि भी पूछा जाएगा। ये सवाल पहले कभी नहीं पूछे गए थे। देश में वोटर लिस्ट है, राशन कार्ड है, आधार नंबर है। फिर नए सिरे से नागरिकों के नाम लिखने की जरूरत क्यों है? 

दरअसल इस छोटे और गैरजरूरी से दिखने वाली एनपीआर सूची के पीछे एक बड़ा खेल है। इस खेल की इबारत पहली बार 2003 में लिखी गई थी, जब अटल बिहारी वाजयेपी प्रधानमंत्री और लालकृष्ण अाडवाणी गृहमंत्री थे। उस सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन किया और देशभर में नागरिकों को पहचान-पत्र जारी करने के नए नियम बनाए। उसका अधूरा इस्तेमाल कांग्रेस के राज में 2010 में हुआ था, लेकिन पूरा खेल अब खेला जा रहा है। एनपीआर तो सिर्फ पहला कदम है। एनपीआर का उद्देश्य एनआरसी यानी भारतीय नागरिकों का रजिस्टर बनाना है। 2003 के नियमों में इसकी पूरी प्रक्रिया बनी हुई है। पहले एनपीआर के बहाने आपके घर में रहने वाले लोगों की लिस्ट बना ली जाएगी। उस वक्त कोई प्रमाण नहीं मांगे जाएंगे। सूचना देकर आप भूल जाएंगे। फिर कोई सरकारी बाबू चुपचाप से इनमें से किन्हीं भी नामों के आगे "डी’ (डाउटफुल, यानी जिन पर शक है) लिख सकते हैं। नियम में कहीं यह नहीं बताया कि डी लिखने का क्या आधार होगा। अगर आपके नाम पर डी लग गया तो आपको नोटिस आएगा। अब आपको कागज दिखाकर यह साबित करना होगा कि आप भारत के नागरिक हैं। आप पूछेंगे कौन से कागज? हमारे सामने असम का उदाहरण है। असम में जब यह लिस्ट बनी थी, वहां सरकार ने वोटर लिस्ट, राशन कार्ड या आधार नंबर को नागरिक होने का सबूत नहीं माना।

नागरिकता की इस परीक्षा में फेल होने वाले किसी एक जाति या एक धर्म के लोग नहीं होंगे। वो सब लाखों-करोड़ों बेकसूर, गरीब इसका शिकार होंगे, जिनके पास अपने और अपने मां-बाप के जन्म और संपत्ति आदि के पूरे कागज नहीं हैं। जब सिर्फ एक राज्य असम में नागरिकता का रजिस्टर बना तो 19 लाख लोग उससे बाहर निकल गए थे। राजस्थान की जैसलमेर तहसील में 2003 से 2009 के बीच नागरिकता रजिस्टर का पायलट प्रोजेक्ट यानी पहला प्रयोग हुआ। छह साल तक प्रयास करने के बाद भी इस तहसील के 2.08 लाख लोगों में से 44 हजार लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए। सवाल यह है कि अगर विदेशियों की पहचान करनी है तो सरकार सिर्फ उन इलाकों या लोगों की जांच क्यों नहीं कर लेती जिनके बारे में शक या शिकायत है? पिछले सप्ताह राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने एनपीआर पर तीन बात कहकर देश को आश्वस्त करने की कोशिश की। एक तो उन्होंने कहा कि एनपीआर के दौरान कोई दस्तावेज नहीं मांगे जाएंगे। दूसरा, उन्होंने कहा की कोई सूचना देना अनिवार्य नहीं होगा। दिक्कत यह है कि 2003 के नियम 7 में साफ लिखा है कि सही सूचना देना घर के मुखिया के लिए अनिवार्य होगा। तीसरा, उन्होंने यह बड़ी घोषणा भी कर दी कि किसी के नाम पर "डी" नहीं लिखा जाएगा। मगर 2003 के नियम 4(4) में साफ लिखा है कि एनपीआर की सूची से संदेहास्पद लोगों को चिह्नित किया जाएगा। इस बयान के बाद सभी आंदोलनकारियों ने मांग की कि राज्यसभा में मौखिक आश्वासन के अनुरूप गृहमंत्री इन नियमों में संशोधन कर दें तो वो एनपीआर से सहयोग करने को तैयार हैं। लेकिन, उसके बाद से सरकार ने चुप्पी साध ली है। गृहमंत्री चाहें तो सिर्फ बयान देने की बजाय नियम बदल सकते हैं, कि किसी के नाम के आगे "डी’ नहीं लिखा जाएगा और एनपीआर का इस्तेमाल नागरिकों की छंटाई के लिए नहीं किया जाएगा। केंद्र नहीं चाहे तो भी राज्य सरकार इसे रोक सकती है। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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