कॉलम / हमें चाहिए असरदार राज और ताकतवर समाज



dainik bhaskar column by gurcharan das
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dainik bhaskar column by gurcharan das

  • इसे मुमकिन बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को साहस के साथ शासन संबंधी सुधार लागू करने चाहिए

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2019, 10:39 PM IST

नरेन्द्र मोदी के फिर चुने जाने के बाद धीरे-धीरे बढ़ती तानाशाही का भय फिर जताया जा रहा है लेकिन, मुझे उलटी ही चिंता है। मुझे शक्तिशाली से नहीं बल्कि कमजोर व बेअसर राज्य-व्यवस्था (राज) से डर लगता है। कमजोर राज्य-व्यवस्था में कमजोर संस्थान होते हैं, खासतौर पर कानून का कमजोर राज होता है, जिसे न्याय देने में दर्जनों साल लग जाते हैं और अदालतों में 3.3 करोड़ प्रकरण निलंबित रहते हैं। यह कमजोरों को शक्तिशाली के खिलाफ संरक्षण नहीं देती और विधायिका के हर तीन में से एक सदस्य के आपराधिक रिकॉर्ड को बर्दाश्त कर लेती है। कमजोर राज्य-व्यवस्था लोगों के मन में निश्चिंतता के बजाय अनिश्चितता पैदा करती है और पुलिसकर्मियों, मंत्रियों और जजों को खरीदे जाने की अनदेखी करती है। यह कार्यपालिका को तेजी से कार्रवाई करने से रोकती है और सुधारों को घोंघे की रफ्तार से लागू करती है।

 

मोदी ने पिछले पांच वर्षों में यह सबक लिया होगा कि भारतीय प्रधानमंत्री की शक्ति की सीमा है। उदारवादी लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था तीन स्तंभों पर आधारित होती है-प्रभावी कार्यपालिका, कानून का राज और जवाबदेही। हम तीसरे स्तंभ की बहुत चर्चा करते हैं, जबकि असली मुद्दा पहले का है। चूंकि देश हमेशा चुनावी मोड में रहता है तो इसकी समस्या जवाबदेही की नहीं है। समस्या राज्य व्यवस्था के काम करवाने की योग्यता की है। भारतीय प्रधानमंत्री इसलिए भी कमजोर है, क्योंकि असली शक्ति तो राज्यों के मुख्यमंत्रियों में निहित है, जो भारत के असली शासक हैं। विडंबना है कि मुख्यमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के प्रदर्शन के कारण उन्हें 2014 में चुना गया था और हमने मान लिया था कि वे प्रधानमंत्री बनने के बाद वही जादू दिखाएंगे लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। 

 

2014 में नरेन्द्र मोदी ने लोगों से कहा कि वे उन्हें भारत को पूरी तरह बदलने के लिए दस साल दें। यह मौका उन्हें मिल गया है। वह बदलाव आर्थिक सुधारों से नहीं, बल्कि शासन संबंधी सुधारों से शुरू होना चाहिए। मोदी ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर से प्रेरणा ले सकते हैं। उन्होंने शासन संबंधी कठिन सुधारों को दूसरे कार्यकाल के लिए रखा। भारत में राज्य-व्यवस्था की क्षमता बढ़ाना आसान नहीं है, क्योंकि चीन के विपरीत भारत ऐतिहासिक रूप से एक कमजोर राज्य-व्यवस्था वाला देश रहा है। हमारा इतिहास स्वतंत्र राज्यों का है, जबकि चीन का इतिहास एकल साम्राज्यों का है। भारत के चार साम्राज्य -मौर्य, गुप्त, मुगल और ब्रिटिश- चीन के सबसे कमजोर साम्राज्य से भी कमजोर थे।

 

हमारी पहली वफादारी समाज के प्रति है- हमारा परिवार, हमारी जाति, हमारा गांव। चाहे राज्य-व्यवस्था ज्यादातर कमजोर रही पर भारत में हमेशा शक्तिशाली समाज रहा है। इसलिए दमन शासन ने नहीं किया, यह समाज की ओर से हुआ मसलन जैसा ब्राह्मणों ने किया और हमें दमन से बचाने के लिए बुद्ध जैसे संन्यासी और संतों की एक सतत धारा की जरूरत पड़ी। चूंकि सत्ता ऐतिहासिक रूप से बिखरी हुई थी तो भारत 70 साल पहले संघीय लोकतंत्र और चीन केवल तानाशाही राष्ट्र ही बन सकता था। इतिहास से मिला सबक है कि हमें मजबूत राज्य-व्यवस्था चाहिए और राज्य-व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए ताकवर समाज चाहिए।

 

विडंबना है कि आज चीन की सरकार भारत की सरकार से ज्यादा लोकप्रिय है, क्योंकि इसने असाधारण प्रदर्शन किया है। न सिर्फ इसने गरीबी मिटा दी है, देश को मध्यवर्गीय बना दिया बल्कि यह लगातार दिन-प्रतिदिन के शासन में सुधार करती जा रही है। कुल-मिलाकर चीन ने आम आदमी को बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य दिया और उनका कल्याण किया। तानाशाही व्यवस्था इसकी सफलता का रहस्य नहीं है बल्कि रहस्य यह है कि इसने राज्य की क्षमता पर फोकस रखा। जहां चुनावों ने भारतीय लोगों को अधिक स्वतंत्रता दी है (और यह बहुत बड़ी उपलब्धि है), चीन की सरकार ने बेहतर शासन के जरिये दिन-प्रतिदिन की निश्चिंत ज़िंदगी दी है। कहने का मतलब यह नहीं कि भारतीयों को अपनी व्यवस्था चीनियों से बदल लेनी चाहिए (उन्हें भी ऐसा नहीं करना चाहिए)। किंतु यदि आप भारतीय व चीनी आम आदमी की जगह खुद को रखकर देखें तो आपको भारतीय लोकतंत्र द्वारा चुनी गई ज्यादातर सरकारों से हताशा होगी।

 


चीन ने अपनी नौकरशाही को ज्यादा प्रेरित व प्रभावी बनाकर शासन की क्षमता बढ़ाई। इसका मतलब है अधिकारियों के प्रदर्शन पर निकट से निगाह रखना और उन्हें पुरस्कृत करना है। चीनी नौकरशाही में पदोन्नति वरिष्ठता से नहीं बल्कि नागरिकों को बेहतर सेवाएं देने के आधार पर होती है। इससे चीनी नौकरशाह, नियमों से बंधे भारतीय अधिकारियों के विपरीत अधिक व्यावहारिक रवैया अपनाने को प्रेरित होते हैं। भारतीय नौकरशाही दशकों से पीड़ित रही है, क्योंकि किसी राजनेता में उन अत्यंत जरूरी सुधार लागू करने का कौशल नहीं था, जिस पर पचास साल पहले सहमति बनी थी। कर वसूली का एक ईमानदार और पारदर्शी तंत्र, अधिक कर वसूल कर सकेगा। यही बात राज्य-व्यवस्था के तीन अंगों –न्यायपालिका, पुलिस व संसद में सुधारों पर लागू होती है।

 

क्या नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रभावी नेता साबित होंगे, जो निहित स्वार्थी तत्वों का सामना करके राज्य-व्यवस्था की क्षमता बढ़ाने का साहस दिखाएंगे? उन्हें गुजरात व केंद्र दोनों स्तरों पर काफी अनुभव प्राप्त है। वे निहित स्वार्थी तत्वों से टकराने के जोखिम भी जानते हैं। शुरुआत स्पष्ट दिखते आसान सुधारों से हो सकती है। यानी पहले तो मौजूदा कानून लागू करें, फिर नए कानून बनाएं। नीति का रिश्ता ‘क्या’ से नहीं बल्कि ‘कैसे’ से होता है। हर कोई जानता है कि ‘क्या’ किया जाना चाहिए पर सवाल तो यह है कि इसे ‘कैसे’ किया जाए। भारत में बहुत सारे ‘कानून’ हैं पर चीन में ‘व्यवस्था’ है। आप को दोनों की जरूरत है- ‘कानून और व्यवस्था’ (लॉ एंड ऑर्डर)। 

 

हालांकि, केंद्रीकृत शासन भारत के लिए ठीक नहीं है पर भारत का प्रधानमंत्री इतना मजबूत होता है कि वह केंद्र व राज्य, दोनों स्तरों पर शासन की क्षमता बढ़ा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी को लोगों का जबर्दस्त समर्थन मिला है, जो शासन में सुधार के लिए सुनहरा मौका है। सरकारी संस्थानों में सुधार, आर्थिक सुधारों से कहीं अधिक कठिन होगा लेकिन, फिर उसके फायदे भी कहीं ज्यादा होंगे। यदि मोदी सफल होते हैं तो इतिहास में उन्हें न सिर्फ महान नेता के रूप में बल्कि इस बात के लिए भी जाना जाएगा कि उन्होंने ‘न्यूनतम सरकार,अधिकतम शासन’ का अपना वादा पूरा किया। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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