कॉलम / आरोप-प्रत्यारोप जो हमें कम मानवीय बनाता है



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  • जब अपराध दुर्दांत हो तो धरती पर मौजूद सबसे मजबूत व्यक्ति के सपोर्ट की जरूरत होती है

कावेरी बामजई

कावेरी बामजई

Jun 14, 2019, 11:36 PM IST

कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ पहले बलात्कार हुआ और फिर उसकी हत्या कर दी गई। जम्मू-कश्मीर में जल्दबाजी में बने हिंदू एकता मंच ने इस मामले में सजायाफ्ता बलात्कारी दीपक खजुरिया के बचाव में तिरंगा लेकर जुलूस निकाला। लगभग एक साल बाद, अलीगढ़ में एक ढाई साल की बच्ची की हत्या कर दी जाती है। बच्ची हिंदू और उसके कथित हत्यारे को मुस्लिम बताया जा रहा है। इस मामले में बच्ची के साथ दुष्कर्म की अफवाह भी तेजी से फैल रही है। कठुआ में छोटी बच्ची के लिए इंसाफ की मांग करने वालों को घेरने के लिए एक गैंग काफी ज्यादा प्रभावी नजर आई। उन्होंने समान आक्रोश की मांग "प्लेकार्ड-दिखाती' हस्तियों से की, जबकि रवीना टंडन जैसी बड़ी सेलिब्रिटी ने "बर्बर बलात्कार" के बारे में ट्वीट किया और कोयना मित्रा ने जोर देकर कहा, "मैं हिंदुस्तान हूं। एक गर्वित हिंदू। मैं इतनी उदार नहीं हूं कि आपके बलात्कारियों का समर्थन कर सकूं।'

 


समकालीन भारत में झूठी समानता की मांग आम है। यहां प्रत्येक दक्षिणपंथी अपराध के लिए कथित वामपंथी दुस्साहस है। यहां बार-बार 2002 के गुजरात दंगे और 1984 के सिख विरोधी दंगों का उल्लेख किया जाता है। और अब घटियापन यहां तक जा पहुंचा है कि  हर "हिंदू' बलात्कार के लिए, अब एक "मुस्लिम' बलात्कार होने लगा है। मोल-तोल में हद तो यह हो रही है कि छोटी बच्चियों की पहचान बेस्वाद लोगों की भूख मिटाने के लिए उजागर कर दी जाती है। जहरीली मर्दानगी से जीत और पितृसत्तात्मकता, महिलाओं द्वारा आत्मसात किए जाने के चलते वे ऐसे बेटों की परवरिश कर रही हैं जिन्हें लगता है महिलाओं और लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार कर वे बच निकलेंगे। फिर भले ही सार्वजनिक प्रवचन महिला उन्मुख विकास पर क्यों न हो रहे हों। भाजपा सांसद साक्षी महाराज बेखौफ होकर उन्नाव में दुष्कर्म के आरोपी एमएलए से मिलने जाते हैं। जबकि 16 साल की वह दुष्कर्म पीड़िता पर अपने डॉक्यूमेंट्स से छेड़छाड़ का आरोप झेल रही है।      

 

दुर्भाग्य से यह तब हुआ जब कठुआ केस में कोर्ट का फैसला आया है। उस केस में जहां बकरवाल बच्ची के साथ गैंगरेप किया। फिर एक स्थानीय मंदिर के स्टोर हाउस में उसे मारकर पास के जंगल में फेंक दिया गया। छह लोगों को अपराधी माना गया। तीन को उम्र कैद सुनाई जबकि तीन को सबूत मिटाने का दोषी पाया गया।  कठुआ और अलीगढ़ मामलों पर आरोप-प्रत्यारोप जैसे-जैसे तेज और गाढ़े होते गए, कहीं न कहीं देश ने अपनी कुछ और मानवीयता खो दी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक नाबालिगों के साथ दुष्कर्म 2012 में 8541 थे जो 2016 में बढ़कर 19765 पहुंच गए हैं। इनमें से 40% उन नाबालिग बच्चियों के साथ हुए दुष्कर्म हैं जिनकी उम्र 15 साल से कम थी। यानी 2016 में 18 साल से कम उम्र की दो बेटियों के साथ हर घंटे दुष्कर्म हुआ। हर बार जैसे ही कोई हंगामा होता है सरकार से स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया आती है। सरकार पर कानूनी कार्रवाई और दुष्कर्म के खिलाफ कानून को कठोर बनाने का दबाव पड़ता है। कठुआ केस के चलते जम्मू कश्मीर की तत्कालीन मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती नाबालिग के साथ दुष्कर्म के आरोपी को सजा-ए-मौत का कानून लाईं। सरकार ने सबूतों का बोझ भी आरोपी पर डाल दिया। लेकिन बच्चों खासकर बेटियों पर खतरा कम नहीं हुआ।

 

सायकोलॉजिस्ट डॉ. रजत मित्रा कहते हैं, हमारे देश में अब वह समय नहीं रहा जब बच्चों से जुड़े दैहिक आकर्षण और शारीरिक शोषण से इनकार किया जाता है। 80 और 90 के दशक तक इन चीजों को पश्चिमी देशों की समस्या माना जाता था। डॉ. मित्रा के मुताबिक 1993 में बेंगुलरू की एक कांफ्रेंस में कोई उनपर ये कहते हुए चिल्ला दिया था कि यह सब भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। इसे वैज्ञानिकी दृष्टिकोण से समझना होगा। हमने अमेरिका में देखा है कि शारीरिक शोषण को नस्लीय मसले के साथ जोड़ दिया जाता था। भारत में ऐसा ही कुछ धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ हुआ है। इस वर्गीकरण ने न्याय को बुरी तरह प्रभावित किया है। बच्चों के साथ दैहिक आकर्षण और नाबालिगों के साथ दुष्कर्म अलग तरह की प्रवृत्ति है। ऐसी प्रवृत्ति वाले लोग बच्चों को बड़ों की तरह देखते हैं। ये बेहद रहस्यमयी, लुभावने और बच्चों का भरोसा जीतने वाले होते हैं। इन्हें बच्चों के साथ दैहिक अनुभूति से ज्यादा कुछ आकर्षित नहीं करता। भारत में दुष्कर्म का खौफ कोई नया नहीं है। 1972 में मथुरा दुष्कर्म मामले के चलते क्रिमिनल लॉ एक्ट 1983 मंे संशोधन किया गया। 1992 में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भंवरी देवी के साथ हुए दुष्कर्म के चलते 1997 में विशाखा गाइडलाइन बनी, जिसमें कार्यस्थल पर शारीरिक शोषण के खिलाफ कानून बना।

 

2003 में सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम की पार्किंग से उसी की कार में स्विस डिप्लोमेट के साथ राजधानी दिल्ली में हुए दुष्कर्म के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर धारणा बदली। इसी दौरान दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा के साथ उस वक्त सामूहिक दुष्कर्म हुआ जब वह अपने दोस्त के साथ बुद्ध जयंती पार्क में घूम रही थी। दुष्कर्म करने वाले प्रेसिडेंशियल बॉडीगार्ड के लोग थे। राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने अगले दो सालों तक इस घृणित घटना के चलते गार्ड ऑफ ऑनर लेने से इनकार कर दिया। जब अपराध इतने दुर्दांत हो तो धरती पर मौजूद सबसे मजबूत व्यक्ति के सपोर्ट की जरूरत होती है। यही लीडर्स को अलग बनाता है और बदलाव लाता है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का खोखला भाषण नहीं। 2013 में लाया 1000 करोड़ का निर्भया फंड आज भी मंत्रालय की अंदरूनी खींचतान में उलझा हुआ है। महिला बाल विकास मंत्रालय का खर्च आज भी उन्हें मिलने वाले बजट से कम है। यहां तक कि राष्ट्रीय पोषण मिशन जैसी स्कीम का फंड भी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया जाता।

 

इस बार लोकसभा में सबसे ज्यादा (78) महिला सांसद चुनी गई हैं। पहली बार जितने पुरुष वोट डालने आए, उतनी ही महिलाएं भी थीं। 2009 में महिला-पुरुष वोटिंग प्रतिशत का अंतर 9% था जो 2019 में 0.4% रहा। पीएम मोदी की जीत में महिला वोटर अहम थीं। सवाल यह कि क्या देश की महिलाओं और बेटियों को वे मर्द मिलेंगे जिसकी वे हकदार हैं? या फिर इसे एक कड़ी सीख की जरूरत होगी?

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