कॉलम / श्रीलंका हमले के बाद आईएस का कितना खतरा?

लेफ्टि.जन. (रिटा.) सैयद अता हसनैन

लेफ्टि.जन. (रिटा.) सैयद अता हसनैन

May 16, 2019, 12:42 AM IST



dainik bhaskar column by Syed Ata Hasnain
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  • संदर्भ- चुनाव प्रचार में उठे मुद्दों से पैदा हुए विभाजन को सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बनने दिया जा सकता

श्रीलंका में आत्मघाती बम विस्फोटों ने उस देश के साथ दुनिया को चकित कर दिया। ये हमले तब हुए हैं जब इस्लामिक स्टेट (आईएस) को उसके सीरियाई क्षेत्रों में पराजित मान लिया गया है। जाहिर है यह जमीनी प्रभुत्व तो खो चुका है पर इसका नेटवर्क और प्रभाव शेष है ताकि वह अपने कथित खिलाफत के बाहर किसी वारदात को अंजाम दे सके। इसके सहयोगी गुट अल शबाब और बोको हरम की मौजूदगी वाले सोमालिया व नाइजीरिया में आतंकी गतिविधियों में तेजी की अपेक्षा थी पर ऐसा हुआ नहीं। अबु सयाफ गुट से सांठगांठ कर फिलिपीन्स में पैर जमाने में भी इसे सफलता नहीं मिली। अफगानिस्तान के अशासित इलाकों में तालिबान की पकड़ इतनी मजबूत है कि वहां आईएस के लिए गुंजाइश नहीं है। पाकिस्तान में अलग-अलग कई गुट हैं पर वे किसी के गुर्गे बनने को तैयार नहीं हैं।

 


संभव है कि यह सब सोचकर आईएस प्रासंगिक बने रहने के लिए नई इलाकों की तलाश में हो। इसकी नेटवर्क आधारित मौजूदगी दुनिया के उन हिस्सों के लिए तो खतरा है ही जहां लोगों को फुसलाए जाने का जोखिम हो। वह ऐसे इलाके खोज रहा है, जहां खुफिया नेटवर्क कमजोर हो और पर्याप्त गोपनीय ढांचे के साथ अचानक वारदात की जा सके। कई लोग मानते होंगे कि आईएस के उभार के लिए भारत में गुंजाइश नहीं है, क्योंकि चार साल पहले जब आईएस चरम पर था तब भी भारत के 18 करोड़ मुस्लिमों का बहुत छोटा-सा हिस्सा आईएस की खिलाफत में जाकर उसका हिस्सा बना। जो गए भी उनमें काफी कम बौद्धिक व संघर्ष क्षमता थी।

 

मुंबई के 26/11 हमले के बाद मोटेतौर पर बेदाग रिकॉर्ड वाली अनुभवी भारतीय खुफिया एजेंसियों की मौजूदगी ने भी ऐसी धारणा बनाई होगी। हालांकि, आईएस की सूची में ऐसा इलाका या राष्ट्र हो सकता है, जहां मुस्लिमों के पर्याप्त आधार के साथ लोकतांत्रिक व धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का अस्तित्व हो। इस दृष्टि से भारत का जोखिम बढ़ जाता है। श्रीलंका शुरुआती बिंदु हो सकता है, जहां मुस्लिमों की बहुत छोटी अस्पसंख्यक मौजूदगी है। 

 

जहां तमिलनाडु स्थित तौहीद जमात (टीएनटीजे) ने श्रीलंका में वारदात करने वाले नेशनल तौहीद जमात से कोई संबंध होने से सख्त इनकार किया है पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आईएस जैसी अतिवादी-कट्टरपंथी विचारधारा इंटरनेट व मौखिक प्रचार से ऐसे अतिवादी तत्वों को प्रभावित करें, जो जरूरी नहीं आईएस के इलाके से ही लौटे हों। श्रीलंका में जांच में मौखिक प्रचार से बने नेटवर्क का पता चला है, हालांकि दावे के बावजूद आईएस का संबंध पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है। यदि आईएस संभावित ठिकानों की खोज में है तो पूरे भारत में ऐसे पर्याप्त स्थान है, क्योंकि मुस्लिम किसी एक राज्य में सीमित नहीं हैं। केवल मुस्लिमों की मौजूदगी आतंकवाद को जड़ें जमाने का आमंत्रण नहीं हो सकता। ऐसा मानना उतना ही बुरा है, जितना सारे मुस्लिमों पर संभावित आतंकियों का लेबल लगाना।

 

कट्टरपंथी वे तत्व होते हैं, जो मानते हैं कि उनकी ही विचारधारा को मौजूद रहने का हक है और वे अन्य सारे लोगों को उनकी आस्था में बदलने के लिए हिंसा का सहारा लेने को भी तैयार रहते हैं। पाकिस्तान में एक आत्मघाती हमलावर से जब पकड़े जाने के बाद पूछा गया कि उसने उन लोगों को क्यों मारा जो मुस्लिम ही थे, तो उसका कहना था कि वे सच्चे मुस्लिम नहीं थे, क्योंकि सच्चे मुस्लिम वहीं हैं जो मजहब का वैसा पालन करते हैं जैसा वह व उसके साथी करते हैं। यही आईएस की कट्टर किस्म है, जिससे दुनिया लड़ रही है। 

 


कई लोग सोचते हैं भारत अपनी बहुलता की ताकत के कारण आईएस से बच निकला। जहां यह बात सही है और खुफिया एजेंसियों ने भी मौटेतौर पर पाकिस्तान व अंतरराष्ट्रीय अपराधिक गुटों द्वारा स्थापित कट्टरपंथी गुटों को अलग-थलग कर हाथिये पर डाल दिया है पर भारत खतरे से बाहर नहीं है और श्रीलंका में हुए हमले इसे साबित करते हैं। वास्तव में भारतीय मुस्लिम अलग किस्म के हैं। उन्हें हर धर्म के लोगों के साथ काम करने और खान-पान साझा करने का मौका मिलता है। ऐसे शहर भी हैं जहां जब दोनों धर्मों के त्योहार साथ आते हैं तो हिंदू-मुस्लिम साथ बैठकर धार्मिक जुलूसों के निकलने के रूट व टाइमिंग तय करते हैं।

 

ऐसा अंतरधार्मिक सौहार्द दुनिया में कहीं मिलना दुर्लभ है। लेकिन, फिर भी दोनों तरफ ऐसे तत्व है, जो शांति से नहीं बैठ सकते। आईएस जैसे गुट इन दोनों तत्वों द्वारा परस्पर भय फैलाने से निर्मित विभाजन पर फलता-फूलता है। विभाजन की राजनीति हमेशा मजबूत से मजूबत समाजों खासतौर पर लोकतंत्रों में मौजूद रही है। मजबूत समाज इसे थोड़े-बहुत झटकों के साथ काबू कर लेते हैं जैसा भारत अभी अनुभव कर रहा है। एक तरफ भारत में विभाजन बढ़ाने की पाकिस्तानी रणनीति है तो दूसरी तरफ आईएस जैसे गुट हैं। दोनों के हित भिन्न हो सकते हैं पर काम करने का तरीका समान है।

 

हम यह दावा नहीं कर सकते कि भारत ने इन प्रयासों के खिलाफ अपने को महफूज कर लिया है। ऐसे तत्व होंगे जो मिथ्या प्रचार से प्रभावित हो सकते हैं, जिसे सोशल मीडिया ने इतना आसान बना दिया है। फर्जी और नफरत फैलाने वाले संदेश साइबर जगत में हावी रहेंगे और उनका कहीं असर भी होगा जैसा श्रीलंका में हुआ। हमारे यहां खाड़ी से लौटने वाले श्रीलंका की तुलना में अधिक लोग हैं। हर किसी की पर्याप्त निगरानी संभव नहीं है। इसी तरह स्लीपर सेल भी मौके के इंतजार में रहते हैं। 

 


खुफिया एजेंसियों के सामने अपना काम स्पष्ट है। चुनावी प्रलाप ने विभाजन पैदा किया है तो वोट बैंक भी। लेकिन, इसे भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा नहीं बनने दिया जा सकता। धर्म गुरुओं की जिम्मेदारी है कि वे धर्म की सही व्याख्या करें। भारत में सही सोच-समझ वाले व्यक्ति व संस्थान पर्याप्त संख्या में हैं, जो पाकिस्तान व आईएस जैसे गुटों के मनसूबों को नाकाम करने के लिए सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारतीय मुस्लिमों को ऐसे दमदार नेता चाहिए, जो मार्गदर्शन, नेतृत्व व सही सलाह दे सकें।

 

समुदाय में अज्ञान का स्तर इतना अधिक है कि उसेे बरगलाए जाने का जोखिम  बना रहता है। उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों को भी यह जोखिम रहता है, इसे देखते हुए समुदाय के भीतर से ही सुधार की जरूरत रहेगी। यह तभी होगा जब समुदाय को अनावश्यक रूप से लेबल लगाकर उसे खलनायक बताने को भी रोका जाए। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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