अमेरिकन डिप्लोमेसी / कश्मीर मुद्दे की असली स्थिति समझ गया है अमेरिका



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)

  • मोदी-ट्रम्प चर्चा में तय हो गया कि अमेरिका मध्यस्थता नहीं करेगा

Dainik Bhaskar

Sep 13, 2019, 12:50 AM IST

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35 ए को खत्म करने के एक माह बाद अब अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन में इस मामले में भारत के रुख और कश्मीर की जमीनी वास्तविकताओं की बेहतर समझ बनी है। समझा जाता है कि फ्रांस के बियारित्ज में जी-7 के शिखर सम्मेलन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की जो मुलाकात हुई थी, उसी ने इस मामले में अमेरिकी नीति को आकार देने में मुख्य भूमिका निभाई। समझा जाता है कि मोदी-ट्रम्प चर्चा में तय हो गया कि अमेरिका कश्मीर के मामले में भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता नहीं करेगा। इसे दक्षिण एशियाई पड़ोसियों को ही मिलकर द्विपक्षीय आधार पर सुलझाना होगा। यही तो पिछले कई दशकों से अमेरिका का परम्परागत रुख रहा है। ट्रम्प प्रशासन के जानकार सूत्रों का कहना है कि अब कश्मीर चर्चा की टेबल से बाहर है।


इसी के साथ सीमा पार आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर व्यापक घुसपैठ कराने के पाकिस्तान के रिकॉर्ड को देखते हए वॉशिंगटन ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया है। कोई अचरज नहीं कि अमेरिका और भारत खुफिया सहयोग अथवा नापाक गतिविधियों की निगरानी में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जरिये आपस में सहयोग कर रहे हों। अमेरिका ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि आतंकी गतिविधियों की फाइनेंसिंग के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करने के कारण संयुक्त राष्ट्र के फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स द्वारा वह काली सूची में डाल देने की कगार पर पहुंच गया है। अमेरिका ने पाकिस्तान से कहा है कि वह यह सुनिश्चित करें कि नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति में कोई बदलाव न हो, वहां तनाव न बढ़े। इसमें  सीमा पार से घुसपैठ और आतंकवाद के द्वारा ऐसी परिस्थितियां पैदा न होने देने की बात भी शामिल है। किंतु इसके साथ अमेरिका ने भारत से भी आग्रह किया है कि वह जितनी जल्दी हो सके जम्मू-कश्मीर में लगे प्रतिबंध हटा लें। अमेरिकी अधिकारियों को लगता है कि मानव अधिकार वह क्षेत्र है, जिसमें भारत को खुद होकर सक्रिय पहल कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं पर गौर करना चाहिए।


जहां अमेरिका को कश्मीर की जमीनी हकीकत और वहां नई दिल्ली के सामने मौजूद चुनौतियों की पूरी समझ है, अमेरिका में मौजूद भारत विरोधी ताकतें पूरी ताकत और व्यापक लाबिइंग से कश्मीर में मानवाधिकार के मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर उठाने में लगी हैं। पाकिस्तान ने तो वॉशिंगटन डीसी में चार लॉबिइंग समूहों की सेवाएं ली हैं, जबकि भारत ने एक ही ग्रुप को इस काम में लगाया है। सच तो यह है कि पाकिस्तान और इसके समर्थक विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं यानी पाकिस्तान खुद को शिकार बताकर पेश कर रहा है। इसका नतीजा यह है कि मानवाधिकार के मुद्दे को सर्वाधिक महत्व देने वाले मीडिया प्रकाशन कश्मीर मुद्दे के कवरेज पर आक्रामक हो गए हैं, जो भारत विरोधियों को खूब रास आता है। दो भारतवंशी अमेरिकी प्रमिला जयपाल और रो खन्ना सहित एक दर्जन से ज्यादा अमेरिकी कांग्रेस व प्रतिनिधिसभा के सदस्यों ने कश्मीर में मानवाधिकार के मुद्दे को उठाया है। उल्लेखनीय है कि राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करना भारत सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने हाल ही में कहा है कि यह जमीनी हालात और इस बात से तय होगा कि पाकिस्तान राज्य में कितना दखल दे रहा है। भारत चाहता है कि पाबंदियों को बहुत सोच-समझकर उठाया जाए, जिसका उद्देश्य जान-माल की रक्षा है। 370 हटाने के बाद की स्थितियों के इस पहलू को ही अमेरिकी मीडिया का एक तबका, थिंक टैंक समुदाय और मानवाधिकार संस्थाएं समझना चाहते हैं। नतीजा यह है कि वे भारत विरोधियों के हितों का शिकार हो गए हैं।


पिछले हफ्ते वॉशिंगटन टाइम्स को दिए इंटरव्यू में भारतीय राजदूत हर्षवर्धन श्रिंगला ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान अफवाहें फैला रहा है। उन्होंने कहा, ‘हमारे विरोधी अफवाहें फैलाने के लिए अमेरिकी मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं और यह प्रयास दुर्भावना से प्रेरित है। पाकिस्तानी इसे धार्मिक व सांप्रदायिक मुद्दा बनाना चाहते हैं, जो यह है नहीं। भारत में दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी है- 20 करोड़। मुझे कहीं ऐसा नजर नहीं आया कि जम्मू-कश्मीर में हमने जो बहुत साहसी पहल की है उस पर मुस्लिम समुदाय ने कोई असंतोष नहीं दिखाया हो।’ ({ललित झा, चीफ यूएस कॉरेस्पॉन्डेंट, पीटीआई)

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