खुली बात / बिहार में दिल्ली मॉडल हो सकता है गेमचेंजर

एन के सिंह

एन के सिंह

Feb 14, 2020, 01:26 AM IST

हाल के दशकों में भारत के सबसे स्वीकार्य नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा के नए अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्‌डा, दिल्ली चुनाव में मिली हार के बाद क्या इस स्थिति में होंगें कि पार्टी को नई दिशा दे पाएं? ध्यान रहे कि राज्यों में पार्टी की हार का सिलसिला थम नहीं रहा है और दिल्ली की हार पिछले दो सालों में सातवीं हार है। हालांकि, इसका दोष नए अध्यक्ष को नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनके पद पर आने के मात्र दस दिन बाद ही विधानसभा चुनाव हुए थे। लेकिन, इस साल के अंत में अब सामने एक और बड़ा चुनाव है, जो भारत की सबसे विवादास्पद राजनीतिक प्रयोगशाला बिहार में होने जा रहा है।

क्या पार्टी अपनी रणनीति परंपरागत ‘वो बनाम हम’ की राजनीति पर टिकाए रखेगी या अगले कुछ महीनों में राज्य के सात करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को विकास का हैवी डोज देकर अपने पाले में करने की कोशिश करेगी। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अस्थायी होता है और जैसे-जैसे साक्षरता, प्रति-व्यक्ति आय और मीडिया के प्रसार से तर्क-शक्ति में इजाफा होता है, संकीर्ण भावनाओं के ऊपर वैज्ञानिक–तार्किक सोच का प्रभाव बढ़ने लगता है। ऐसे में सामान्य मतदाता भी दीर्घकालिक और नैतिक रूप से सही को ही अपना वास्तविक विकास समझने लगता है।

सामूहिक चेतना भी ‘भैंसिया की पीठ से उतरकर’ या ‘तिलक–तराजू और तलवार इनको मारो...’ से हटकर सड़क, बिजली, बच्चों की उपयुक्त शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर जा टिकती है। दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से तीन गुना है और साक्षरता 90 प्रतिशत (जो केवल केरल से कम है) जिसकी वजह से मुख्यमंत्री को आतंकवादी कहना भी मतदाओं को अच्छा नहीं लगा और न ही नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीन बाग के धरने को देश को बांटने वाला बताना। 


नए भाजपा अध्यक्ष की सबसे बड़ी योग्यता है परदे के पीछे रणनीति बनाने का कौशल, जो उन्होंने उत्तर प्रदेश चुनाव में भरपूर ढंग से दिखाया। आमतौर पर परदे के पीछे के रणनीतिकार या ‘चाणक्य’ की संज्ञा ऐसे शख्स को दी जाती है, जो लक्ष्य पाने के लिए हर स्याह-सफ़ेद करने को तत्पर रहे। लेकिन, नड्डा ऐसे रणनीतिकार होते हुए भी सौम्य, मित्रवत और लगभग अजातशत्रु की छवि के धनी रहे हैं। बिहार चुनाव में  पार्टी और इसके गठबंधन को भले ही फिर से सत्ता मिल जाए, लेकिन भाजपा का अस्तित्व अपने जनाधार के भरोसे तब तक तैयार नहीं होगा, जब तक वह तेजी से विकास न करे।


आयुष्मान भारत और बिहार का स्वास्थ्य : कम ही लोग जानते होंगे कि दुनिया में स्वास्थ्य बीमा की सबसे महत्वाकांक्षी योजना आयुष्मान भारत के जन्मदाता नड्‌डा ही रहे हैं। तब वह केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री थे। नीति आयोग ने 23 पैमानों पर आधारित सालाना स्वास्थ्य सूचकांक कुछ माह पहले जारी किया। जिसमें बिहार सबसे निचले पायदान पर है। इस रिपोर्ट की सबसे खास बात यह थी कि बिहार में 2015-16 के मुकाबले 2017-18 में स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट में सबसे ज्यादा तब रही, जब बिहार में स्वास्थ्य मंत्री भाजपा का आया।

इस समय स्वास्थ्य को लेकर अगर भाजपा अध्यक्ष, उनकी पार्टी के स्वास्थ्य मंत्री और नीतीश सरकार, दिल्ली मॉडल पर कुछ नई योजनाएं शुरू कर सके तो दूरगामी परिणाम संभव हैं। अगर सफल होता है तो भाजपा अध्यक्ष यही मॉडल अन्य भाजपा-शासित राज्यों में लागू कर सकते हैं। बिहार में सुविधा यह है कि स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी के लिए सरकारी मशीनरी को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, यानी प्रशासनिक खर्च कम आएगा, क्योंकि इस राज्य का आबादी घनत्व भारत में सबसे ज्यादा (1105 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर) है। 


तस्वीर का दूसरा पहलू : सरकारी व्यवस्था कमजाेर होने की वजह से बीमार पड़ने पर गरीबों को बेहद महंगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं का सहारा लेना पड़ता है। अनेक बार उसे इलाज के लिए खेत-खलिहान भी बेचना पड़ता है। हर साल बीमारी में अपनी जेब से खर्च के कारण चार करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा से नीचे उस रसातल में पहुंच जाते हैं, जहां से उबरना संभव नहीं होता। जहां, हिमाचल प्रदेश की सरकारें अपने लोगों के स्वास्थ्य पर करीब 2500 रुपए प्रति-व्यक्ति प्रति वर्ष खर्च करती है। 

वहीं बिहार में मात्र 450 रुपये और उत्तर प्रदेश में 890 रुपए खर्च होते हैं। नतीजतन बिहार की गरीब जनता को सरकारी खर्च का पांच गुना अपनी जेब से लगना पड़ता है। बिहार का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है। कुल मिलकर सरकारी उदासीनता के कारण स्वास्थ्य पर लोगों का अपनी जेब से खर्च बढ़ता जा रहा। इसीलिए सरकार इस खर्च को बढ़ाकर स्थिति में भारी बदलाव ला सकती है। 

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