मैनेजमेंट फंडा / त्वचा के रंग से चरित्र का पता नहीं लगता

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Jan 13, 2019, 11:50 PM IST



Does not know the character from the color of the skin
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Does not know the character from the color of the skin
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कई बार कहे जाने के बाद आखिर पिछले हफ्ते मैंने रणवीर सिंह और सारा अली खान की ‘सिम्बा’ देखी। फिल्म की मेरी ग्रेडिंग से रोहित शेट्‌टी की कमाई पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला! लेकिन, मेरे मन में दो प्रश्न उठे। विलेन जिस गैंग को शिकार के मोबाइल में उसके खिलाफ मौजूद सबूत लेने के लिए पुलिस थाने भेजता है उसके सारे सदस्य सांवले रंग के, खराब कपड़े पहने तथा शेव न किए हुए थे।

 

उनमें और भी ऐसे बाहरी फीचर थे, जो हमारे मन में उनके बुरे व्यक्ति होने का अहसास जगाते हैं कि वे बुरे लोग हैं? हीरोइन द्वारा चलाए जा रहे रेस्तरां में हर कोई गोरा क्यों है और उन्होंने सौम्य रंगों के वस्त्र क्यों पहने हैं, जिनसे उनके अच्छे लोग होने का अहसास पैदा होता है?

 

मुझे इन प्रश्नों के जवाब में मेरे दोस्त के दोस्त के जीवन में कुछ माह पहले घटी घटना याद आई। करुणा तमिलनाडु के तिरुवन्नमलाई में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान और एक कॉलेज चलाते हैं। उनकी बहन और उसके पति दोनों डॉक्टर हैं और एक दशक से उनकी कोई संतान नहीं है।

 

काफी पूजा-पाठ और चिकित्सा के बाद करुणा की बहन को अंतत: जुड़वा बच्चे हुए और दुर्भाग्य से उनमें से एक की मौत हो गई। परिवार दूसरे बच्चे को लेकर बहुत रक्षात्मक रवैया रखता था। जब बच्चा दो साल का हुआ तो उस संपन्न परिवार ने कान छेदने, मुंडन कराने जैसे संस्कारों का आयोजन किया, जो किसी विवाह समारोह से भी ज्यादा भव्य था।


आयोजन के दिन वैदिक रस्मों के बाद जब भोजन परोसा जाना था, तब बच्चा खो गया। अचानक करुणा और उसकी बहन एक-दूसरे पर बच्चा सौंपने का आरोप लगाने लगे। कुछ ही मिनटों में पंडाल में हर कोई लापता बच्चे को खोजने लगा पर कोई फायदा नहीं हुआ। सौ लोगों की टीम बनाकर पूरे शहर में तलाश की गई। लगभग सभी खाली हाथ लौटे।

 

जब करुणा लौट रहे थे तो उन्होंने तमाशा दिखाने वाले एक व्यक्ति के आस-पास भीड़ देखी। वह व्यक्ति आजीविका के लिए अपनी पांच साल की बेटी को तनी हुई रस्सी पर चलवा रहा था। तमाशे के उस दल का नेता यानी मदारी सांवले रंग का था, जो 4.5 इंच का डमरू बचा रहा था। यह वही वाद्य है, जिसे भगवान शिव क्रोधित होने पर बजाते हैं। इसके शोर से करुणा को चिढ़ हो रही थी और शब्द नकारात्मक लग रहे थे, क्योंकि वह शख्स 20 फीट ऊंची बंधी रस्सी पर चल रही लड़की के जोखिम का वर्णन कर रहा था। करीब डेढ़ सौ लोग बच्ची की बहादुरी भरा करतब देख रहे थे।


करुणा ने भीड़ पर निगाहें दौड़ाईं। अचानक उन्होंने अपने भतीजे को करतब दिखाने वाले दल के नज़दीक बैठकर केला खाते और उसका शो देखते देखा। किसी भूखे तेंदुए की तरह वे ‘हटो..’ कहकर भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक सेकंड में बच्चे को पकड़ लिया। मदारी ने डमरू बजाना बंद कर दिया और पूछा ‘क्या यह आपका बच्चा है?’ करुणा बेकाबू होकर बहते आंसुओं के साथ एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे थे इसलिए उन्होंने गर्दन हिलाकर ‘हां’ कहा। मदारी ने कहा, ‘चूंकि बच्चा भूखा था तो मैंने उसे केला देकर यहां बैठने को कहा।

 

’ बच्चे के प्रति सहानुभूति व दया का व्यवहार देखते हुए करुणा ने अपना पर्स निकाला, जिसमें 2 हजार रुपए के 30 से ज्यादा नोट थे। उन्होंने वे सारे निकालकर मदारी को देने चाहे। इतने पैसे देखने के बाद भी मदारी की आंखों में कोई चमक नहीं आई। उसने पैसे लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

 

उसने हाथ से नोटों को परे धकेला जिससे वे जमीन पर गिर गए। उसने कहा, ‘क्या सर, आप मुझे छोटा-सा केला देने के पैसे चुका रहे हैं। बच्चा तो बच्चा है, किसका है इसका कोई महत्व नहीं है। करुणा अपने आंसू नहीं रोक सके और उन्होंने मदारी को कसकर गले लगा लिया।’ वे सोच रहे थे कैसे उनके संस्थान के शिक्षक 500 रुपए की वृद्धि के लिए नौकरी बदलकर दूसरे कॉलेज चले जाते हैं और यह व्यक्ति है कि 60 हजार रुपए का तोहफा लेने से इंकार कर रहा है!


फंडा यह है कि : सारे सांवले रंग के लोग ठग नहीं होते और सारे गोरे, अच्छे कपड़े पहने लोग सज्जन नहीं होते- सिम्बा का असली विलेन याद है? वह सफेद पोशाक पहना व्यक्ति है।

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