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हाथों में बड़ी-सी लौकी लटकाए और उससे भी ज्यादा मुँंह लटकाए हाजी पण्डित दरवाजे पर दस्तक देते उससे पहले ही मैं अम्मा-बाबूजी के पास गांव जाने के लिए दरवाजा खोल रहा था। हाजी पण्डित मेरे घर के मेन गेट पर इस बार होली न मनाने की सूचना का बैनर लगा देख आए थे। सो टकराते ही उन्होंने पूछा- ‘अमां महाकवि! यह कौन सी बात हुई भला? होली काहे नहीं मना रहे हो? मैं कुछ दिनों के लिए इधर-उधर क्या गया, अमां, तुम तो अजीब-अजीब फैसले लेने लगे!’ मैंने बिना किसी भंगिमा-विशेष के इस अपेक्षित प्रश्न का उत्तर हाजी के आगे सरकाया- ‘यार हाजी, मन नहीं है। देख तो रहे हो हालात। एक तरफ तो चीनी चांडालों के फैलाए इस कोरोना ने बांध रखा है, दूसरी तरफ़ सियासत के चंपकों ने दिल्ली के माहौल में ज़हर घोल रखा है! किस मन से होली खेलें?’ हाजी तपाक से बोले- ‘तुम अजीब अजीत पंवार छाप आदमी हो यार? यूं तो हर वक्त, हर बात पर नेताओें को गरियाए रहोगे और अब मस्ती के इस महापर्व में दूसरों की फैलाई कीचड़ के डर से रंग नहीं खेल रहे? अरे ऐसे समय में ही तो कवि-धर्म जागना चाहिए। लगाओ जोगीरे के छौंक और कह डालो जनता के दिल की वे सब बातें जो हर साल देश तुमसे सुनना चाहता है। अब नहीं कहोगे तो कब कहोगे? उधर तुम्हारे लाइलाज दोस्त का छुटभैय्या अमानती ताहिरबाज दंगों में बांटे मौत के सामान के साथ गिरफ़्तार हो रहा है। पुराना वाला अमानती छुटभैय्या कह रहा है कि वो मुसलमान है इसलिए गिरफ़्तार हुआ। ये बहुरूपिये तो अपने आका की शह पर हिन्दू-मुसलमान करके गंद करें, और हम त्यौहार मनाने से भागते रहें?’ मैंने कहा- ‘बात त्यौहार से भागने की नहीं है। बात इन बहुरूपियों की भी नहीं है। बात सिर्फ ये है कि हम साम्प्रदायिकता के कोहरे में इतना कैसे भटक जाते हैं कि यह तक याद न रहे कि इस तथाकथित हिन्दुओं के त्यौहार के सबसे झनकदार गीत वाजिद अली शाह, अमीर ख़ुसरो, रसखान और नज़ीर अकबराबादी जैसे शायरों ने लिखे हैं। हमें यह क्यों नहीं याद रहता कि शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनकी टोली द्वारा पहना गया बसंती चोला तक चटख नहीं हो सकता जब तक अशफ़ाक़ उल्ला जैसे दीवाने उसे अपने तन से नहीं लगाते। यही सब देख कर मन उदास है हाजी। ऊपर से इस बीमारी ने और आतंक मचा रखा है!’ हाजी ने बात छोड़ी- ‘अजी छोड़ो बीमारी की। हाथ धो लेने भर से डरने वाली बीमारी हमें क्या डराएगी? तुम तो बेफालतू में होली छोड़ रहे हो। तुम्हारी होली से तो तमाम न्यूज़ चैनलों को होली के दिन का कंटेंट मिलता था। अब वो भी कितनी बार सूर्यवंशम दिखाएं बेचारे!’ मैंने कहा- ‘अरे हाजी, मीडिया का क्या है, वो तो तैमूर के डाइपर से ले कर ट्रम्प के शैम्पू तक कुछ न कुछ ढूंढ ही लेगा दिन बिताने को। उनका मन बनाने के लिए अपना मन और ज़्यादा ख़राब नहीं कर सकता। होली तो नहीं खेलूंगा। हां, होलिका जरूर जलाऊंगा- नकारात्मकता की, साम्प्रदायिकता की, नफरत की और हिंसात्मक मानसिकता की।
‘हर तरफ तकरारों का शोर
मोहल्ले नफरत के हर ओर
हवा में इतना ज़्यादा ज़हर
सांस की उलझी-उलझी डोर
गले मिल कर हम और आप
जलाएं होली में सब पाप
प्यार के रंगों में इस बार
चुनरिया रंग दे रे रंगरेज’
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