जनगणना कानून / पहली डिजिटल जनगणना और संवेदनशील डेटा

रीतिका खेड़ा

रीतिका खेड़ा

Feb 15, 2020, 12:40 AM IST

आजकल जब व्यक्ति केंद्रित निजी जानकारी (या डेटा) दुनियाभर में चर्चा में है, तब जनगणना जैसी सामूहिक, जनसमुदाय के डेटा की अहमियत बढ़ जाती है। जनगणना में इकट्‌ठा की जाने वाली जानकारी काफी व्यापक होती है- जनसंख्या, उसमें महिला-पुरुष का अनुपात, जाति, शिक्षा का स्तर, उम्र, जन्म-मृत्यु, लोगों के घरों के स्थिति (कच्चा-पक्का), पलायन, व्यवसाय, आदि। आबादी के बारे में ये सभी जानकारियां देश में प्लानिंग के नज़रिये से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जनगणना देश की वास्तविक स्थिति समझने के काम आती है। उदाहरण के लिए, राजनीतिक भाषणों के चलते कई लोगों के मन में धारणा है कि फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) का लोगों के धर्म से गहरा संबंध है। जनगणना की बदौलत पता लगने वाला यह तथ्य आश्चर्यचकित कर देगा। 2001 और 2011 के बीच उत्तरप्रदेश में हिंदू महिलाओं में टीएफआर 4.1 से घटकर 2.6 तक पहुंचा। उस दौरान केरल की मुस्लिम महिलाओं में यह 2.6 से 2.3 हुआ।

जब आजादी के सत्तर सालों में देश की उपलब्धियों पर सवाल उठाए जाते हैं तब भी जनगणना में एकत्रित जानकारी का सहारा लेना पड़ता है। इसके जरिये ही हमें पता लगता है कि भारत में 1951 में औसतन लोग 32 साल तक जी पाते (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) थे, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 65 साल से ज्यादा हो गए। 1951 में पैदा होने वाले (हर हज़ार) बच्चों में से 180 अपने पहले जन्मदिन तक नहीं बचते थे। 2011 में यह संख्या 40 से कम हो गई है और केरल में तो सिर्फ 12 है।

1951 में दस में से एक ही महिला शिक्षित थी, 2011 तक शिक्षित महिलाओं की दर 65 प्रतिशत पार कर गई थी। इन साधारण से आंकड़ों से हमें पता चलता है कि देश ने विकास की राह पर, कितना सफर तय कर लिया है और कितना रास्ता आगे तय करना बाकी है। निजी जानकारी का आज इतना ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि इस शोर में पुराने तरीके से इकट्‌ठा किए डेटा की कद्र करना लोग भूल रहे हैं।


चुनाव और राजनीति के लिहाज से भी जनगणना अहम है। जब चुनावी सीटें तय होती हैं तो जनसंख्या के आधार पर ही तय किया गया था कि कितने लोगों पर लोकसभा और विधानसभा में प्रतिनिधि चुना जाएगा। भारत में 1971 के बाद लोकसभा में प्रतिनिधियों की संख्या नहीं बढ़ाई गई। इसके पीछे एक अहम कारण यह है कि देश में दक्षिण के राज्यों में जनसंख्या बढ़त की दर घटी है, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में उस गति से कम नहीं हुई है।

उन राज्यों का देश की जनसंख्या में अनुपात बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में दक्षिण राज्यों का मानना है कि यदि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधि तय हुए तो लोकसभा में उनकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी। भारत में जनसंख्या पर काबू पाना पहले से बड़ी चुनौती थी, दक्षिण के राज्यों ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके बावजूद, उन्हें इस योगदान के लिए उनकी लोकसभा की सीटें घटाकर ‘दंडित' करना अन्यायपूर्ण होगा।

इसी विवाद के चलते 2001 में जो "डीलिमिटेश’ आयोग बनाया गया, उसके सुझावों पर 2026 तक रोक लगा दी गई है। इसके अलावा अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजातियों (आदिवासियों) के लिए संसद और विधानसभाओं में कितनी सीटें आरक्षित होंगी और उन्हें शिक्षा और नौकरी में कितना आरक्षण मिलेगा, यह भी जनसंख्या में उनकी आबादी पर निर्भर करता है। 


जनगणना की इकोनॉमिक प्लानिंग में भी बड़ी भूमिका है। ज्यादातर टैक्स (आयकर, जीएसटी) केंद्र सरकार द्वारा वसूले जाते हैं, हालांकि आर्थिक गतिविधियों में राज्य सरकारों का बहुत बड़ा योगदान होता है। इसलिए, संविधान में वित्त आयोग (फाइनेंस कमीशन) का प्रावधान है। वित्त आयोग का एक महत्वपूर्ण काम यह है कि टैक्स से प्राप्त पैसों को केंद्र और राज्यों के बीच किस आधार पर बांटा जाए। इसमें राज्य की जरूरतों और उनके आर्थिक योगदान के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन है।

इसके लिए भी राज्य की जनसंख्या एक महत्वपूर्ण मापदंड होती है। गौरतलब है कि 1948 में पारित जनगणना कानून में स्पष्ट था कि जनगणना से मिली लोगों की जानकारी गुप्त रखी जाएगी। लोगों की जिम्मेदारी थी कि मांगी गई जानकारी वे जनगणना अधिकारियों से साझा करें और रजिस्ट्रार जनरल की जिम्मेदारी थी कि एकत्रित जानकारियां सरकार के अन्य विभाग या मंत्रालय, किसी से भी बंंाटी नहीं जाए। यह इसलिए कि लोगों की निजी जानकारी सार्वजनिक होने से उन्हें नुकसान हो सकता है।

देश में बहुत से दलित हैं, जिन्होंने फैसला किया कि वे अपना सरनेम इसलिए नहीं इस्तेमाल करेंगे, क्योंकि उनके साथ भेदभाव होता है। जनगणना के दो मुख्य चरण हैं - "हाउस-लिस्टिंग’(मकान सूचीकरण) और वास्तविक जनगणना। पहला चरण इस वर्ष अप्रैल से शुरू होगा और जनगणना अगले साल फरवरी में होगी। 2010 पिछली जनगणना में हुए हाउस लिस्टिंग में नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) को जोड़ा गया। इस बार कई संवेदनशील जानकारियां पूछी जा रही हैं।

7 जनवरी 2020 को जारी गजट में 31 मापदंडों की सूची दी गई है, जिसमें व्यक्ति का नाम, मोबाइल नंबर, जाति आदि शामिल हैं। साथ ही एनपीआर में वोटर कार्ड और आधार नंबर जैसे अन्य पहचान-पत्रों की जानकारी जोड़ने की बात कही गई है, जिसका देशभर में विरोध हो रहा है।

अहम सवाल यह है कि एनपीआर में एकत्रित जानकारी पर भी क्या गोपनीयता के वही प्रावधान लागू होते हैं, जो जनगणना कानून के तहत जनगणना में दी गई जानकारी पर लागू होते हैं? इसी से जुड़ा हुआ एक और जरूरी सवाल है कि यदि इस बार की जनगणना इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस पर होगी, तो फिर इन दोनों डेटा को जो हाउस लिस्टिंग के तहत इकट्‌ठा किए जा रहे हैं और एनपीआर वाले सवाल को अलग-अलग कैसे रखा जाएगा?

 
जनगणना कानून में लोगों की सही जानकारी देने की जिम्मेदारी के साथ-साथ सूचनाओं को सुरक्षित रखने की सरकार की जिम्मेदारी भी रेखांकित की गई है। डिजिटल युग में सूचना को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के कई उदाहरण सामने आए हैं और इस बार की जनगणना भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी, इसलिए नागरिकों का सरकार से यह सवाल पूछना बेहद आवश्यक है। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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