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नैतिक विपक्षियों पर ही प्रभावी हैं गांधी सिद्धांत

5 महीने पहलेलेखक: शशि थरूर
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महात्मा गांधी (फाइल फोटो।)
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हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे अहम कदम दांडी मार्च को 90 साल हो गए हैं। ब्रिटिश राज के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया यह सबसे सफल अवज्ञा आंदोलन था। ब्रिटिश शासन ने उस समय भारतीयों के नमक बनाने और बेचने पर प्रतिबंध व भारी कर लगा दिया था, जिससे लोग महंगा और विदेशी नमक लेने को मजबूर थे। इस नमक कर का विरोध तो 19वीं सदी में ही शुरू हो गया था, लेकिन 12 मार्च 1930 को गांधीजी द्वारा आंदोलन शुरू करने से ही सफलता हासिल हुई। गांधीजी ने साबरमती के अपने आश्रम से दांडी के लिए यात्रा शुरू की। 385 किलोमीटर की इस यात्रा में उनके साथ कई दर्जन अनुयायी भी शामिल थे। वे अपने हर पड़ाव पर लोगों को संबोधित करते थे और उनके साथ चलने वाले लोगों की संख्या बढ़ती जाती थी। वह 5 अप्रैल 1930 को समुद्र के किनारे दांडी पहुंचे और अगले दिन 6 अप्रैल को उन्हाेंने मुट्‌ठीभर नमक बनाकर प्रतिकात्मक रूप से कानून का उल्लंघन किया। यह नागरिक अवज्ञा का बहुत ही प्रभावी काम था। इस नाटकीय घटनाक्रम ने देश और दुनिया का ध्यान खींचा। गांधीजी ने नमक कर के खिलाफ दो महीने तक आंदोलन किया और अन्य लोगों को भी नमक कानून तोड़ने के लिए उकसाया। हजारों लोगाें को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मई में गांधीजी को भी गिरफ्तार किया गया। इससे दसियों हजार लोग इस आंदोलन में शामिल हो गए और 21 मई 1930 को करीब 2500 सत्याग्रहियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। साल खत्म होते-होते 60 हजार लोगों को जेलों में डाल दिया। बाद में ब्रिटिश शासन को अहसास हुआ कि दमन और जेल में डालने से कुछ लाभ नहीं है। जनवरी, 1931 में गांधीजी को रिहा कर दिया गया और लॉर्ड इरविन से वार्ता शुरू हुई। 5 मार्च 1931 को हुए गांधी-इरविन समझौते के बाद गांधीजी ने सत्याग्रह समाप्त कर दिया। उनकी नैतिक विजय हो चुकी थी। गांधीजी के दांडी मार्च को याद करने की वजह यह है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज कई तरह से जवाहरलाल नेहरू के 15 अगस्त 1047 की मध्यरात्रि को दिए गए प्रसिद्ध भाषण ‘नियति से साक्षात्कार’ के शब्दों की प्रतिध्वनि कर रही है। तब उन्होंने महात्मा को ‘भारत की भावना का अवतार’ बताते हुए कहा था कि उनके संदेश को भावी पीढ़ियां याद रखेंगी। संदेश क्या था? महात्मा दुनिया के पहले सफल अहिंसा आंदोलन के अप्रतिम नेता थे। उनकी आत्मकथा थी ‘सत्य के प्रयोग’। दुनिया की कोई भी डिक्शनरी सत्य के अर्थ को उतनी गहराई से परिभाषित नहीं करती, जितना गांधीजी ने किया। उनका सत्य उनके दृढ़ मत से निकला था। यानी यह केवल सटीक नहीं था, लेकिन यह न्यायपूर्ण था इसलिए सही था। सत्य को अन्यायपूर्ण या असत्य तरीकों से नहीं पाया जा सकता। यानी अपने विरोधियों के खिलाफ हिंसा करके। इसी तरीके को समझाने के लिए गांधीजी ने सत्याग्रह की खोज की। वह इसके लिए अंग्रेजी शब्द पैसिव रजिस्टेंस (निष्क्रिय विरोध) को नापसंद करते थे, क्योंकि सत्याग्रह के लिए निष्क्रियता नहीं, सक्रियता की जरूरत थी। अगर आप सत्य में विश्वास करते हो और उसे पाने की परवाह करते हो तो गांधीजी कहते थे कि आप निष्क्रिय नहीं रह सकते, आपको सत्य के लिए दुख उठाने के लिए सक्रिय तौर पर तैयार रहना होगा। अहिंसा विपक्षी को चोट पहुंचाए बिना सत्य को साबित करने का तरीका था, बल्कि इसके लिए खुद चोट खाई जा सकती थी। गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए यह रास्ता चुना और यह प्रभावी रहा। दांडी तो सिर्फ इसका प्रतिमान था। जहां छिटपुट चरमपंथ और उदार संवैधानिकता दोनों ही निष्प्रभावी रहे, वहां गांधीजी स्वतंत्रता का मुद्दा लोगों तक ले गए। उन्होंने लोगों को वह तकनीक दी, जिसका अंग्रेजों के पास कोई जवाब नहीं था। हिंसा से दूर रहकर गांधीजी ने पहले ही बढ़त ले ली थी। अहिंसात्मक रूप से कानून को तोड़कर उन्होंने इसके अन्याय को भी दिखा दिया था। खुद पर लगाए गए दंडों को स्वीकार करके उन्होंने बंदी बनाने वालों का ही उनकी क्रूरता से सामना कराया। खुद पर ही भूख हड़ताल जैसे कष्ट थोपकर उन्होंने दिखाया कि वह सही वजह से की जा रही अवज्ञा के लिए किस हद तक जाने को तैयार हैं। अंत में उन्होंने अंग्रेजों के शासन को ही असंभव बना दिया।  आज के भारत में गांधीजी और दांडी से हमें क्या सीख मिलती है? एक चीज को समझना होगा कि गांधीजी का रास्ता उन्हीं विपक्षियों के खिलाफ काम करता है, जिन्हें नैतिक अधिकार खाेने की चिंता होती है, एक सरकार जो घरेलू और अंतराष्ट्रीय राय के प्रति उत्तरदायी हो और हार पर शर्मसार होती हो। गांधीजी की अहिंसात्मक नागरिक अवज्ञा की ताकत यह कहने में निहित है : ‘यह दिखाने के लिए कि आप गलत हैं, मैं खुद को दंडित करूंगा।’ लेकिन इसका उन लोगों पर कोई असर नहीं होता, जो इस बात में इच्छुक ही नहीं हैं कि वे गलत हैं और पहले से ही अपने साथ असहमति की वजह से आपको दंडित करना चाहते हैं। आपके खुद को सजा देने की इच्छा तो उनके लिए विजय का सबसे आसान तरीका होगा। नैतिकता के बिना गांधीवाद वैसा ही है जैसे कि सर्वहारा वर्ग के बिना मार्क्सवाद। इसके बाद भी जिन लोगों ने यह तरीका अपनाया वह उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी और नैतिकता है। जबरन हड़ताल, पाखंडी क्रमिक धरना और धरनाें के दुरुपयोग से यही पता चलता है कि दुनिया गांधीजी के सत्य के विचार से कितना गिर गई है। इससे गांधीजी की महानता कम नहीं हुई है। जब, दुनिया फासीवाद, हिंसा और युद्ध में बंट रही थी, महात्मा ने हमें सत्य, अहिंसा और शांति का मतलब सिखाया। उन्हाेंने ताकत का मुकाबला सिद्धांतों से करके उपनिवेशवाद की विश्वसनीयता खत्म कर दी। उन्हाेंने ऐसे व्यक्तिगत मानदंडों को हासिल किया, जिसकी बराबरी शायद ही कोई कर सके। वह एक ऐसे दुर्लभ नेता थे, जिनका दायरा समर्थकों तक सीमित नहीं था। उनके विचारों की मौलिकता और उनकी जिंदगी के उदाहरण आज भी दुनिया को प्रेरणा देते हैं। लेकिन, हमें आज भी गांधीजी से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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