सुर्खियों से आगे / माॅडर्न गॉड आस्था की कीमत वसूलना शुरू कर चुके हैं

निमेश शर्मा

निमेश शर्मा

Jan 29, 2020, 12:52 AM IST

गूगल को गॉड ऑफ इंटरनेट कहा जा सकता है। वो हर जगह है। अमर है। अनंत है। प्रार्थनाओं की तरह सवालों को सुनता भी है। हर सवाल का जवाब भी देता है। वह उन 15 फीसदी नए सवालों को भी उतने ही धैर्य से लेता है, जो पहली बार पूछे जाते हैं।  दरअसल, गूगल टेक्नोलॉजी से जुड़ी वो आस्था है, जो हर घर में है। हर दफ्तर में है। पर आखिर ऐसा क्या है, जो गूगल को इतना ताकतवर बनाता है? हम असंख्य यूजर्स की इन्फॉर्मेशन ही गूगल की सबसे बड़ी ताकत है।

हमसे जुड़ा इतना बड़ा डेटा किसी और कंपनी के पास नहीं है। अमेरिकी प्रोफेसर स्कॉट गेलोवे ने दुनिया की इन दिग्गज कंपनियों पर एक शोध किया है। जो बताता है कि किस तरह गूगल, अमेजॉन, फेसबुक जैसी कंपनियां हमारी भावनाओं से खेलती हैं। गेलोवे कहते हैं- बिना हमारे शरीर के किसी हिस्से या उससे जुड़ी भावनाओं को टारगेट किए बिना कोई कंपनी मल्टी बिलियन डॉलर की नहीं बन सकती। 

गूगल दिमाग के सवालों को शांत करता है। फेसबुक दिल की भावनाओं से जुड़ा है। आप तारीफें सुनना चाहते हैं। प्यार जताना चाहते हैं। अमेजाॅन पेट से जुड़ा है। खरीदने की हर भूख शांत करता है। पर आज गूगल की बात क्यों? दरअसल गूगल ने कुछ ऐसा किया है, जो सर्वोच्चता के उसके भाव को और मजबूती से स्थापित करता है। गूगल पहली बार कानूनी प्रक्रिया से जुड़े मामलों में अमेरिकी सरकार को इन्फॉर्मेशन देने के बदले पैसे चार्ज करने वाला है।

साधारण शब्दों में कहें तो किसी यूज़र की कम्युनिकेशन डिटेल्स जैसी जानकारियां पाने के लिए करीब साढ़े 17 हजार रुपए चुकाने होंगे। इस फैसले को भारतीय नजरिए से देखेंगे तो इसकी विशालता और असर का अनुमान लगा पाएंगे। दुनिया में इंटरनेट के दो सबसे बड़े यूजर्स हैं। चीन और भारत। लेकिन दोनों में बहुत बड़ा बुनियादी फर्क है। भारत के पास सिर्फ यूजर्स हैं, वहीं चीन के पास अपना इंटरनेट मैकेनिज्म।

2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार- भारत में 97.35% यूजर्स गूगल का इस्तेमाल करते हैं। वहीं चीन में सिर्फ डेढ़ फीसदी। चीन के पास खुद का सर्च इंजन- बायडू है। 70 फीसदी से ज्यादा चीनी उसी का इस्तेमाल करते हैं। भारत पूरी तरह गूगल पर निर्भर है। गूगल का यह फैसला अगर भारत आता है तो हमारी पुलिस जो पहले ही बजट के संकट से जूझती रहती है। क्या वो गूगल के इन सर्च वारंट्स की फीस चुका पाएगी? 

मुकदमों में लगातार डिजिटल एविडेंस पर जोर बढ़ रहा है। पुलिस की निर्भरता भी गूगल पर बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों खबर आई- रूस ने भी अपना इंटरनेट सिस्टम डेवलप कर लिया है। यह तैयारी उस स्थिति के लिए है, जब अमेरिका का वर्ल्ड वाइड वेब में हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। भारत में भी एक अच्छी शुरुआत हुई है। देश का अपना नेविगेशन सिस्टम- नाविक आ रहा है। लेकिन अफसोस यह है कि यहां हर शुरुआत किसी निराशाजक नतीजे के बाद शुरू होती है।

रूस ने जब क्रायोजेनिक इंजन की टेक्नोलॉजी देने से इनकार किया तो इसरो ने अपनी टेक्नोलॉजी डेवलप की। जब अमेरिका ने कारगिल युद्ध के समय जीपीएस एक्सेस देने से इनकार किया, तब जाकर देश के अपने नेविगेशन पर काम शुरू हुआ। बहरहाल, आखिर क्यों हम सिर्फ एक बड़ा यूजर बेस बनकर रहना चाहते हैं? क्यों नहीं अपना मैकेनिज्म तैयार करें, जो भविष्य के भारत के लिए हो।

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