मन की आवाज / भावना के स्तर पर जांच नहीं सकते तो शब्द और आदत के स्तर पर समझें

बी के शिवानी

बी के शिवानी

Feb 22, 2020, 01:36 AM IST

आत्मा का जो मूल स्वरूप है उसका असली गुण प्यार, स्नेह, आनंद, पवित्रता है। आत्मा जो बीज है जब वह अपने असल रूप में आ जाएगी तो उसमें से निकला हर विचार, हर शब्द और हर कर्म स्वत: ही खरा होगा। इसी असलियत और खरे व्यवहार पर हम काम कर रहे हैं। हमें कई बार जीवन जीने के तरीके को, देश में जीने के तरीके, समाज में जीने के तरीके, बिजनेस, प्रोफेशन जो भी हम कर रहे हैं उसको करने के तरीके, लोगों के साथ रहने के तरीके को जांचना और समझना पड़ता है।

वास्तव में देखा जाए तो इंसान सही है तो जिंदगी खुद-ब-खुद सही हो जाएगी। आत्मा पवित्र है तो क्या हमारी हर सोच पवित्र है। हमारी हर सोच एकदम साफ है। उसमें कोई मिलावट तो नहीं है? किसी के प्रति थोड़ा सा भी आलोचनात्मक होना ठीक नहीं है। किसी से ईर्ष्या से अगर मैं कुछ बोल रहा हूं तो उसका कुछ और ही अर्थ तो नहीं निकल रहा है। कई बार हम बोल तो मीठा रहे हैं लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि हम सोच कुछ और रहे हों? 


दूसरा तरीका है हम बोल कुछ रहे हैं लेकिन बोलकर हम कुछ सुनाने की कोशिश कर रहे हैं उनको। मुझे अपने तरीके से कुछ काम करवाना है तो मैं लोगों के साथ कैसा व्यवहार कर रही हूं। यही कुछ चीजें हमारा जीवन जीने का तरीका बन चुकी हैं। अब वो इस स्तर पर चला गया है कि इंसान बतौर कई बार हमें इल्म भी नहीं होता। और फिर वह धीरे-धीरे संस्कार बन जाता है।

खुद-ब-खुद बदल जाने के चलते पता भी नहीं होता कि मैं जो सोच रहा हूं वह सही है या नहीं? मान लीजिए मुझे आपको कुछ समझना है और मैं आपको सीधे तरीके से नहीं बता सकती हूं तो मैं उसको घुमाकर आपके सामने किसी दूसरे को सुनाकर कहूंगी। लेकिन इन सब चीजों में हमारी जो भावनाएं होती है वे दूषित हैं। जब हम इंसान बतौर जांचते हैं तो पूरी तरह उसे जांच नहीं पाते। 


ये तो समझ आ जाता है कि भावना अच्छी नहीं है, लेकिन उतना एहसास नहीं होता और उतना ध्यान नहीं देते कि मुझे अपनी हर सोच हर भावना का पता चल जाए। ये समझ आए कि हर भावना अच्छी, पवित्र है या नहीं और उसे बदला जाए या नहीं। लेकिन संस्कार बदलना है तो भावना को बदलना होगा।

हम आसान तरीके से ऐसा कर सकते हैं। हर चीज को भावना के स्तर पर जांच नहीं सकते लेकिन उसे शब्द और आदत के स्तर पर जांच सकते हैं। जो बहुत आसान होता है और सामने दिखाई दे जाता है। इंसान बतौर बदलाव यानी आत्मा के संस्कार को बदला। सोच बदली तो कर्म अपने आप बदल गया।  


मान लीजिए किसी का संस्कार हमें सुनाने का है, ताना मारने का। तो वह इंसान का असल संस्कार नहीं है। क्यों आत्मा का खरा संस्कार तो पवित्रता है। लेकिन धीरे-धीरे करते-करते मेरा ये संस्कार बन गया कि हमें ऐसे ही सुनाना है। हमें ऐसी बात कहनी है कि दूसरे को समझ आ जाए, लेकिन कई बार वह इससे दुखी भी हो जाता है।

कई बार हम इसका ध्यान सोच के स्तर पर नहीं रख पाते हैं। आत्मा की जांच हो और संस्कारों पर काम करें तो सोच अपने आप बदल जाती है। तब हमारा स्वभाव और हमारी आदतें अपने आप बदल जाएंगी। भीतर से आत्मा को बदल दें तो बाहरी परिवेश खुद बदल जाएगा।

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