जीने की राह / ईश्वर से जुड़ना है तो जैसे हैं, वैसे दिखें

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Feb 14, 2020, 12:32 AM IST

यह हमारे भारत के परिवारों का मनोविज्ञान है कि यदि लड़की वाले के घर लड़के वाले रिश्ता लेकर आ रहे हों तो जो भी बेहतर प्रस्तुति हो सकती है, लड़की वाले करते हैं। कुछ देर के लिए तो पूरे परिवार में एक बेचैनी, खलबली सी मची होती है। और यदि लड़की वालों के मन में यह बात हो कि लड़के वालों को सब कुछ जम जाए, यह रिश्ता तय हो जाए तो एक और दबाव उन पर आ जाता है।

दो परिवार जब रिश्ता करने निकलते हैं तो सबसे पहले एक-दूसरे को टटोलते हैं। टटोलने की उस प्रक्रिया में जासूसी भी हो सकती है। उसके बाद दूसरे चरण में आगे बढ़कर एक-दूसरे के रिश्ते को छूते हैं। और तीसरे चरण में रिश्ते को महसूस किया जाता है, तब जाकर हां या ना होती है..। यह एक पुराना मनोविज्ञान है जो हमारे परिवारों में चला आ रहा है।

आइए, इसे थोड़ा अध्यात्म से जोड़कर देखें। यदि आप परमपिता परमेश्वर को घर लाना चाहते हैं, जीवन में उतारना चाहते हैं तो वो ही मनोविज्ञान काम करेगा जो लड़की वालों के घर में करता है। मतलब बेहतर से बेहतर प्रस्तुति।

जब बाहरी लोग हमारे घर आते हैं तो हम घर को भर लेते हैं, तरह-तरह की वस्तुओं से सजा लेते हैं, लेकिन जब ऊपर वाला घर में आता है तो हमें घर खाली करना पड़ेगा, क्योंकि खाली करने पर ही उसे जगह दे पाएंगे। परिवार में रिश्ते तय होते हैं अच्छे से अच्छा दिखाने से, पर ईश्वर से रिश्ता तय होता है जैसे हैं, वैसा खुलकर दिखाने से।

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