खुली बात / छोटे विवाद नहीं बड़ा परिदृश्य देखें भारत-अमेरिका

हर्ष वी पंत

हर्ष वी पंत

Feb 18, 2020, 01:55 AM IST

डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर अगले सप्ताह अपनी पहली भारत यात्रा पर आ रहे हैं। इससे यह बात अहम हो गई है कि पिछले एक दशक में भारत-अमेरिका संबंध किस तरह आगे बढ़े हैं। पिछले वर्ष जून में ट्रम्प प्रशासन ने भारत के विशेष व्यापार दर्जे को खत्म कर दिया था, इसके तहत 5.6 अरब डॉलर (392 अरब रुपए) का सामान भारत से बिना शुल्क के मंगाया जा सकता था।

2018 में अमेरिका ने भारत से स्टील और एल्युमिनियम के आयात पर भी शुल्क लगा दिया था। भारत ने भी अमेरिका के हर कदम का जवाब उसकी ही भाषा में देते हुए उसके 1.4 अरब डॉलर के सामान पर 23 करोड़ डॉलर का शुल्क लगा दिया था। इससे इस बात की आशंका होने लगी थी कि दोनों देशों के बीच व्यापार को लेकर तनाव बढ़ सकता है।


हालांकि, जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालना गलत हो सकता है। हाल के महीनों में भारत-अमेरिका की राजनयिक वार्ताओं को लेकर नकारात्मक हेडलाइंस के बावजूद दोनों देशों के संबधों का आधार मजबूत रहा है। अमेरिकी व्यापार परिषद की 44वीं बैठक में विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने भारत व अमेरिका के संबंधों में हुई बढ़ोतरी की ओर ध्यान दिलाते हुए दोनों देशों को हिंद-प्रशांत क्षेत्र समेत पूरी दुनिया में और सहयोग बढ़ाने की जरूरत पर बल दिया।

पूर्व कार्यकारी रक्षा मंत्री पैट्रिक शनाहन ने भी सिंगापुर में शंगरी-ला वार्ता में में दोनों देशों के रक्षा संबंधों की प्रशंसा करते हुए भारत को अपना प्रमुख रक्षा सहयोगी करार दिया था। कुछ छोटी-मोटी बातों को छोड़ दिया जाए तो शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से ही भारत व अमेरिका के संबंध लगातार बढ़ते रहे हैं।

2008 का नागरिक परमाणु समझौता इस दिशा में एक बड़ा कदम था। 2018 में भारत को स्ट्रैटजिक ट्रेड ऑथोराइजेशन (एसटीए)-1 सूची में शामिल करने से भारत को अमेरिका से हथियार बंद ड्रोन जैसी संवेदनशील तकनीक आयात करने की अनुमति मिल गई थी। 2016 में भारत को अमेरिका के साथियों के समान ही प्रमुख रक्षा सहयोगी का दर्जा मिलने के बाद इस सूची में शामिल करना सही कदम माना गया।

पिछले साल दोनों देशों के बीच मंत्रिस्तर की 2+2 वार्ता, संचार क्षमता और सुरक्षा समझौता, अमेरिकी प्रशांत कमान का नाम हिंद-प्रशांत कमान करना व तीनों सेनाओं के युद्धाभ्यास पर सहमति होना महत्वपूर्ण है। ये समझौते बताते हैं कि भारत और अमेरिका चुनौतियों से निपटने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सहयोग स्थापित करना चाहते हैं।


व्यापार के मोर्चे पर हालांकि अमेरिकी व्यापार घाटा 2017 के 27 अरब डॉलर से घटकर 2018 में 21 अरब डॉलर हो गया, लेकिन भारत की व्यापार नीतियां को लेकर ट्रम्प की शिकायतों पर मतभेद बने हैं। भारत के ईरान के साथ व्यापार संबंध और रूस से लंबी दूरी की वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली एस-400 की खरीद ऐसे मुद्दे हैं जो दोनों देशों के संबंधों की गति को कम कर सकते हैं।

लेकिन, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि द्विपक्षीय मतभेदों से भारत-अमेरिका संबंधों पर सीधा असर नहीं हो रहा है, बल्कि ये अमेरिका द्वारा किसी तीसरे देश को निशाना बनाने से हो रहा है। उदाहरण के लिए, रूस पर अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से भारत की रक्षा प्रणाली खरीद प्रभावित हो रही है।

जहां तक रक्षा-उद्योग का सवाल है तो भारत की रूस पर निर्भरता की वजह भारत के अधिकतर प्लेटफॉर्म का रूसी मूल का होना है। इसके अतिरिक्त अगर भारत रूस से दूरी बनाता है तो वह संवेदनशील रक्षा प्रणालियां पाकिस्तान को दे सकता है। विदेश नीति बनाने में स्वायत्तता भारत का एक प्रमुख उद्देश्य रहा है।

माेदी भारत को अमेरिका के काफी निकट ले गए हैं, लेकिन उन्होंने साथ ही चीन व रूस के साथ संबध बढ़ाकर इसे संतुलित किया हुआ है। व्यापार, मध्य एशिया, रूस व 5जी से लेकर कई बातों पर मतभेद और पूर्व के अविश्वास के बावजूद भारत और अमेरिका अप्रसार, आतंकवाद व पाकिस्तान पर आगे बढ़े हैं। आज द्विपक्षीय संबंध नई ऊंचाई पर हैं।

हकीकत में ट्रंप प्रशासन ने हुवावे को उपकरण बेचने के लिए अमेरिकी कंपनियों को अनुमति देकर भारत को 5जी पर नीति बनाने का पर्याप्त मौका दे दिया है। इसी तरह ऊर्जा सुरक्षा के मसले पर ईरान से खाली हुई सप्लाई को उसने पूरा कर दिया है।

आने वाले महीनों में भारत अमेरिका से 18 अरब डॉलर का रक्षा समझौता करने जा रहा है। अब जरूरत है कि दोनों देश छोटे-मोटे मतभेदों से निपटते समय बड़े परिदृश्य को ध्यान में रखें। आखिर यह मतभेदों पर बात करने की ही चाहत है, जिसने भारत व अमेरिका जैसे लोकतंत्रों को प्राकृतिक सहयोगी बना दिया है।

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