संदर्भ / भारत को निर्णायक सामरिक बढ़त की जरूरत

शेखर गुप्ता

शेखर गुप्ता

Feb 05, 2020, 12:14 AM IST

नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) के स्थापना दिवस के मौके पर पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने कहा कि सेनाओं को पाकिस्तान को सात से दस दिन के भीतर पराजित करने की जरूरत है। क्या दुनिया की चौथी सबसे बड़ी सैन्य ताकत पांचवीं ताकत को एक सप्ताह में हरा सकती है? खासकर तब जब दाेनों के पास परमाणु हथियार हों।

आप किसी युद्ध को 7-10 दिन में जीत सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि आप उस विजय को कैसे परिभाषित करते हैं। वास्तविक रणनीतिक मुद्दे जटिल होते हैं और ये उतने मनोरंजक नहीं होते हैं, जैसा कि कुछ कमांडो कॉमिक चैनल इन्हें पेश करते हैं।

वास्तविक जीवन में हमें राजनीतिक और कूटनीतिक इतिहास के साथ ही जीत और हार की परिभाषा को खंगालने की जरूरत होती है। इसलिए यह बहस मोदी से शुरू होकर भुट्‌टो पिता व पुत्री, इंदिरा गांधी, वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी से होते हुए वापस मोदी पर आएगी।


सच यह है कि अब द्वितीय विश्व युद्ध की तरह किसी देश या देशों के समूह को पराजित करना असंभव है। इस युद्ध के बाद हमारे पास ऐसा कोई उदाहरण नहीं है। सबसे ताकतवर अमेरिका भी कोरिया, वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक में विफल हो चुका है। केवल शासन को बदलना जीत नहीं है। अफगानिस्तान में सोवियत विफलता ने उनकी पूरी विचारधारा व उनके सैन्य ब्लाॅक को ही खत्म कर दिया।

अमीर और शक्तिशाली सऊदी अरब छोटे से यमन को पांच वर्ष में भी हरा नहीं सका है। इराक ने 1980 में ईरान पर हमला किया, लेकिन आठ साल के बाद भी उनके हाथ लाशों के अलावा कुछ नहीं आया। आप बहस के लिए बोस्निया का उदाहरण बता सकते हो।

लेकिन, एक छोटे से देश में बहुराष्ट्रीय सेनाओं द्वारा शासन को बदलना एक देश द्वारा दूसरे को हराने जैसी जीत नहीं है। हमने 73 वर्ष में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ चार युद्ध लड़े। इनमें दो में ही फैसला हुआ। 1971 में हम पाकिस्तान से जीते और 1962 में चीन से हारे।


1971 में भारत ने जो युद्ध जीता, वह 13 दिन चला। चीन से हारा युद्ध एक विराम के साथ दो पखवाड़ों में खत्म हो गया। इसलिए, इस विचार पर हंसें नहीं कि एक ताकतवर देश दूसरे को सात से दस दिन में हरा सकता है। हमारी पीढ़ी ने घर में ही ऐसा दो बार देखा है। यह हमें इस मुद्दे के केंद्र पर ले आता है। जब आज के आधुनिक देश लड़ते हैं तो हम जीत या हार को कैसे परिभाषित करेंगे?

1971 में जिस क्षण ढाका पर कब्जा हुआ इंदिरा गांधी ने बराबरी वाले पश्चिमी सेक्टर में युद्ध विराम का प्रस्ताव कर दिया। जिस क्षण पाकिस्तान ने इसे स्वीकार किया, वह विजय घोषित कर सकती थीं। इसी तरह, 1962 में चीन ने एक तरफा युद्ध विराम का प्रस्ताव किया और लद्दाख के कुछ क्षेत्रों को छोड़कर युद्ध से पहले वाली स्थिति में लौटने की घोषणा की। जिस क्षण भारत ने इसे स्वीकार किया, चीन जीत की घोषणा कर सकता था। चीनी मैदानों में एक जीते न जाने वाले संघर्ष का जोखिम जानते थे, वैसे ही श्रीमती गांधी पश्चिमी सेक्टर की सैन्य बराबरी को समझती थीं।


इसलिए, एक युद्ध तब नहीं जीता जाता, जब एक देश व्यापक तौर पर हरा दिया जाए, उसे नाजी जर्मनी व राजशाही वाले जापान की तरह घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया जाए। यह तब जीता जाता है, जब कोई देश तय करता है कि उसने अपने उद्देश्य को हासिल कर लिया है। अब एक युद्ध को जीतने के सबसे पहले आपको अपने उद्देश्य को तय करना होगा।

इसके बाद आपके पास उस क्षण को पहचानने की दूरदृष्टि हो कि कब विजय घोषित करनी है। जितनी जल्दी हो उतना बेहतर। कारगिल एक बहुत छोटी लड़ाई थी और हमने इसे इसलिए जीता, क्योंकि वाजपेयी ने सिर्फ पाकिस्तान के नियंत्रण रेखा तक लौटने को ही जीत परिभाषित किया था। वाजपेयी ने जैसे ही अपने उद्देश्य को हासिल किया, जीत की घोषणा कर दी।


1965 की लड़ाई में भारत व पाकिस्तान दोनों ही जीत का दावा करते हैं। पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने के उद्देश्य से यह युद्ध शुरू किया था। अगर सैन्य नजरिये से देखें तो यह एक ड्रॉ क्रिकेट टेस्ट की तरह गतिरोध था। बालाकोट एक जटिल मामला है। भारत ने एक रणनीतिक और राजनीतिक संदेश देने के लिए बालाकोट में घुसकर बम गिराए। उद्देश्य पूरा हो गया।

इसमें पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई की उम्मीद से अधिक कुछ नहीं था। अगले दिन हवा में संघर्ष और एक भारतीय वायुसैनिक के पाकिस्तान में कब्जे में आने व एक भारतीय विमान के मलबे ने दोनों को विजय घोषित करने का मौका दे दिया। संसद हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम एक ऐसा मौका था जहां ऐसा कुछ नहीं हुआ।

कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं था, लेकिन तब तक सेना की तैनाती जारी रही, जब तक कि यह अरक्षणीय नहीं हो गई। हालांकि, यहां पर विजय घोषित करने का क्षण हमले के ठीक एक महीने बाद ही 12 जनवरी 2002 को आ गया था, जब जनरल परवेज मुशर्रफ ने शांति के लिए भाषण दिया। भारत ने यह मौका खो दिया।


युद्ध की अवधि रणनीति से अधिक एक आडंबरपूर्ण काम है। इसका उदाहरण है कि जब ढाका में पाकिस्तानी सैनिक आत्मसमर्पण कर रहे थे, तब जुल्फिकार अली भुट्‌टो भारत के साथ 1000 साल तक लड़ने की बात कह रहे थे। वास्तविकता एकदम सरल है। क्या आप जानते हैं कि विजय को कैसे परिभाषित करना है और आपके पास उस क्षण को पहचानने की दृष्टि है कि इसे कब घोषित करना है?

भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में यह 26 फरवरी 2019 की सुबह एक घंटे में भी हो सकता था या फिर अगले दिन दोपहर तक। लेकिन, इसके लिए भारत की पाकिस्तान पर एक निर्णाणक और परंपरागत रूप से निवारक बढ़त होनी चाहिए।

अगर आने वाले वर्षों में ऐसा हो गया तो पाकिस्तान को एक हफ्ते से भी कम समय में हराना संभव होगा। आप निवारक क्षमता की वजह से बिना लड़े भी जीत सकते हो। लेकिन, निश्चित तौर पर मिग-21 को उड़ाकर तो कतई नहीं। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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