सुर्खियों से आगे / भारत अमेरिका संबंध : बराक ओबामा से डोनाल्ड ट्रम्प तक

संजय आवटे

संजय आवटे

Feb 28, 2020, 02:51 AM IST

डोनाल्ड ट्रम्प जिस नाटकीयता के लिए जाने जाते हैं, वह उन्होंने भारत दौरे में नहीं की। अमेरिका के राष्ट्रपति होने के नाते उन्होंने उस ओहदे की गरिमा बनाए रखी। इसके बावजूद ट्रम्प की यात्रा के अवसर पर बराक ओबामा की भारत यात्रा की याद आना स्वाभाविक है। अमेरिका के राष्ट्रपति रहते हुए बराक ओबामा दो बार भारत आए थे। ओबामा पहली बार आए तो डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और दूसरी बार आए तो वे इस पद पर मोदी से मिले।


ओबामा अच्छे स्पीकर और प्रतिभाशाली लेखक तो हैं ही, उनका पूरा व्यक्तित्व ग्लोबल समझदारी वाला है। श्याम वर्ण पिता और श्वेत वर्ण मां की संतान ओबामा डर की नहीं, भाईचारे की भाषा बोलते हैं। भारत दौरे पर दिए उनके भाषण वर्तमान संदर्भ में भी काफी अहम हैं, जैसा कि वे बोले थे- आपके पास मिल्खा सिंह है, शाहरुख है, मेरी कॉम है कहते हुए उन्होंने भारत-अमेरिका का अलग ही नाता जोड़ा था। 


अमेरिका और भारत में मैत्री की शुरुआत डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से शुरू हो गई थी। उन्होंने अपनी पूरी साख दांव पर लगाकर अमेरिका से परमाणु समझौता किया था। उस समय जूनियर जॉर्ज बुश राष्ट्रपति थे। उसके बाद भारत-अमेरिका के संबंध गहरे होने लगे। विश्व में अमेरिका की छवि युद्ध करने वाले लड़ाकू देश की रही है, बुश के कार्यकाल में यह और ज्यादा गहरी हुई।

इधर, मनमोहन सिंह भी जान चुके थे कि हमारा पड़ोसी चीन है तो ऐसे में अमेरिका से दोस्ती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। प्रतिरक्षा, प्रौद्योगिकी, स्पेस टेक्नोलॉजी और व्यापार भारत-अमेरिका संबंधों के चार प्रमुख स्तंभ हैं। दोनों देशों में संबंध बढ़ाने का विचार इन्हीं आधारों पर किया जाता है। विदेश नीति में निरंतरता जरूरी है और यही नीति आगे ले जाने की कोशिश नरेंद्र मोदी ने की है।


जिस समय ट्रम्प राष्ट्रपति बने उसके बाद का कुछ समय भारत के लिए ठीक नहीं रहा। उनके कई बयान और फैसलों ने भारत की राह कठिन कर दी। बाद में संबंध धीरे-धीरे सुधरने लगे, लेकिन सवाल यह है कि इससे दीर्घावधि में हमें क्या लाभ होगा? अमेरिका में इसी वर्ष चुनाव होने हैं। राष्ट्रपति का कार्यकाल चार वर्ष का होता है और चुनाव वर्ष में राष्ट्रपति का मूल रूप में कोई फैसला न लेना भी एक संकेत हो सकता है। 


देखा जाए तो ट्रम्प की भारत यात्रा उनकी चुनावी रैली की तरह थी। अमेरिका में रहने वाले भारतीयों के वोट वहां के राष्ट्रपति चुनाव में बहुत मायने रखते हैं। इस यात्रा में ट्रम्प की कोशिश भी यही थी कि अमेरिकी भारतीयों के सभी वोट उनकी झोली में गिरें। ट्रम्प की मदद के लिए ही मोदी ने इतने भव्य कार्यक्रम का आयोजन रखा। अहमदाबाद की रैली काफी बड़ी रही, लेकिन ट्रम्प की अपेक्षा से लोगों की संख्या कम थी।

इस बीच मोदी ने ट्रम्प और ट्रम्प ने मोदी की तारीफ करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। उधर, दिल्ली में उपद्रव के दौरान लोग मर रहे थे, बावजूद इसके ट्रम्प ने सीएए या एनआरसी पर एक भी शब्द नहीं बोला। ओबामा ने यात्रा के दौरान मोदी को भारत की उदारता और खुलेपन की याद दिलाई थी। वैसा ट्रम्प कर ही नहीं सकते, क्योंकि यह उनकी छवि के विपरीत होता। ट्रम्प की भारत यात्रा से देश को क्या मिलेगा, इसका विश्लेषण चलता रहेगा। भारत-अमेरिका संबंधों में ‘ओबामा से ट्रम्प’ तक के सफर का सार समझना आसान नहीं है।

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