मन की आवाज / भीतर की शक्ति से बाहरी बैक्टीरिया का सामना कर सकते हैं

बी के शिवानी

बी के शिवानी

Mar 14, 2020, 12:20 AM IST

हमारे शरीर में बैक्टीरिया पहले से होते हैं। जैसे ही हमारे शरीर का इम्युनिटी पावर कमजोर होता है तो छोटे-छोटे वायरस भी थोड़ा सा मौसम बदलते ही हमारे शरीर पर हमला कर देते हैं। यदि मैं मजबूत रहती हूं तो बाहर का मौसम भले बदले, तूफान हो, बर्फ पड़े हमारे ऊपर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मैं अपना ध्यान नहीं रखूं और सिर्फ बोलती रहूं कि मौसम ठीक नहीं है, सर्दी इतनी बढ़ गई, गर्मी बढ़ गई है तो बीमार पड़ना ही है। स्वस्थ रहना है या बीमार रहना है ये दोनों विकल्प हमारे पास है।

जैसे हम अपने शरीर का ध्यान रखते हैं वैसे ही हमें अपने मन का भी ध्यान रखना होगा। यह उस समय नहीं होगा जब परिस्थितियां आती है। आप अपने शरीर के अंदर ताकत तब नहीं भरते हैं जब मौसम बदलता है। आप हर दिन शरीर का ध्यान रखते हैं, फिर चाहे बाहर कितना भी परिवर्तन क्यों न आए वह आपको अंदर से प्रभावित नहीं कर सकता है। 


शरीर के अंदर शक्ति है कि वह बाहर के परिवर्तन के साथ शरीर का सामंजस्य बैठाकर संतुलन बना लेती है। अगर बाहर से इन्फेक्शन आ रहा है तो शरीर का इम्युनिटी पावर उसे कब खत्म कर देता है हमें इसका पता भी नहीं चलता है। और हम सामान्य रूप से कार्य करते रहते हैं। उसी तरह अगर हम मन का भी ध्यान रखें उसकी रोज सफाई करें, पोषण दें, व्यायाम करें तो बाहर कब क्या होगा और चला जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा।

जब जैसी परिस्थिति होती है वैसी ही हमारी खुशी भी हो जाती है क्योंकि यह कुछ-कुछ बाहर की बातों पर निर्भर करती है। लेकिन इसकी अपनी कोई ताकत नहीं है जो हमारी खुशी को प्रभावित कर सके। आप अच्छा बोलो तो खुश, आप अच्छा नहीं बोलो तो भी खुश। इसलिए हमने पहले भी कहा था कि ध्यान रखना। बैक्टीरिया भले आए, कोई बहुत कुछ बुरा-भला भी कह दे, कोई नाराज हो जाएगा, बच्चे संतुष्ट नहीं होंगे, बॉस गुस्सा हो जाएगा, ये सब बैक्टीरिया ही तो हैं जो बाहर से आते हैं। 


आज बच्चे बहुत अच्छी तरह से बात कर रहे हैं कल अचानक उन्होंने कुछ गलत बोल दिया, ये सब परिवर्तन ही तो है जो मौसम में बदलाव लाया है। हमारे अंदर वो शक्ति है जो हम इसका सामना कर सकते हैं। जो स्वयं को सुरक्षित नहीं करेगा वो तो कष्ट सहन करेगा ही फिर चाहे वो शारीरिक हो या भावनाओं के रूप में हो। क्योंकि हमें भावनात्मक सुरक्षा के बजाए शारीरिक सुरक्षा करना आसान लगता है। इसलिए हम इमोशनल हेल्थ की तरफ ध्यान ही नहीं देते हैं।

जब हम अपनी इमोशनल हेल्थ की सुरक्षा करना शुरू कर देंगे तब यह भी आसान हो जाएगा। फिर चाहे कोई कुछ भी बोले हमें फर्क नहीं पड़ेगा। एक दिन आप अपने आपको जांचना कि किसी ने आपसे बात नहीं की, बेइज्जती कर दी, अपमानित कर दिया, कुछ उल्टा-सीधा बोल दिया, तो ऐसी परिस्थिति में मैं क्या कर सकती हूं। क्या मैं इतनी कमजोर हूं कि हर किसी के व्यवहार को अपने ऊपर हावी होने दूं। अगर हम अपना सारा नियंत्रण बाहर को दे देंगे तो दुखी हो जाएंगे। क्योंकि बाहर चुनौतियां बहुत ज्यादा है।

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