जीने की राह / रिश्तों की पवित्र ऊंचाई का पर्व है भाईदूज



jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata
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jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Nov 09, 2018, 12:16 AM IST

नदी को किनारों की या किनारों को नदी की जरूरत है, यह रहस्य कभी समझ में नहीं आता। लेकिन यह भी तय है कि इन दोनों का काम एक-दूसरे के बिना चल भी नहीं सकता। नदी की गति में किनारों की भी भूमिका है और किनारों को बचाने में नदी का भी सहयोग होता है।

 

बस, इन्सान की जिंदगी इसी तरह होती है। सब एक-दूसरे के लिए हैं, एक-दूसरे से अलग भी हैं। मनुष्य की देह में स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के लिए है। देह के स्तर पर जितने रिश्ते हैं उसमें यदि केवल स्त्री-पुरुष मौजूद हैं तो वहां भोग-विलास है। पिता-पुत्री का संबंध उम्र के कारण एक अलग दृष्टि रखता है, लेकिन हम उम्र स्त्री-पुरुष शुद्ध भाव से एक-दूसरे के साथ रहें, यह रिश्ता भाई-बहन का होता है।

 

भारत का हर त्योहार मनुष्य जीवन और उसके पीछे के रिश्तों के गठन की घोषणा है। भाई-बहन का रिश्ता देह से पार चला जाता है। वर्ष में दो दिन भारत इस पवित्र रिश्ते को बहुत अच्छे से याद करता है। राखी पर भाई का वचन होता है और भाई दूज पर बहन की दुआ काम करती है।

 

भाई-बहन एक ऐसा पवित्र संबंध है जो मनुष्य के विपरीत सेक्स को बड़ी पवित्र ऊंचाई देता है। यह रिश्ता एक सोच है, एक नीयत है। इसे जितना अपने भीतर उतारेंगे, आपको अपने मनुष्य होने पर उतना ही गौरव होने लगेगा। आज जब चारों ओर देह को लेकर भोग और संदेह का वातावरण है, ऐसे में यह त्योहार खासकर आज का दिन यह आश्वासन देता है कि कुछ अच्छा सोचा जा सकता है और किया भी जा सकता है।

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