जीने की राह / नेतृत्व शिक्षित तो हो पर संस्कारवान भी हो



jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata
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jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Apr 10, 2019, 01:19 AM IST

क्या नेतृत्व करने वाले का केवल पढ़ा-लिखा होना ही पर्याप्त है? क्या पढ़ा-लिखा व्यक्ति जो भी काम करेगा, जो निर्णय लेगा, वे सब सही होंगे? एक यात्रा के दौरान यह बहस मेरे सामने आई। चुनाव के माहौल में चार लोग जहां इकट्ठे हो जाएं, राष्ट्रीय राजनीति, देश के भविष्य और राजनेताओं के आचरण पर एक-दूसरे पर इतना ज्ञान फेंकते हैं कि यदि आप सिर्फ श्रोता बन जाएं तो भी भरपूर ज्ञान मिल जाएगा।

 

एयरपोर्ट पर कुछ लोग चर्चा कर रहे थे। किसी ने सवाल उछाला कि क्या पढ़ा-लिखा होना ही पर्याप्त है? क्योंकि जनता यह भी मांग कर रही है कि हमारे राजनेता बहुत पढ़े-लिखे होने चाहिए। हमारे शास्त्रों में शिक्षा व शिक्षित व्यक्ति के लिए कहा गया है- ‘नास्ति विद्या समं चक्षु:’।

 

यानी विद्या के समान दूसरा कोई नेत्र नहीं है। सच तो यह है कि पढ़े-लिखे व्यक्ति का मतलब है उसके पास एक ऐसी दृष्टि है, जो निरक्षर या कम पढ़े-लिखों के पास नहीं होगी। इसी दृष्टि को विजन भी कहा जा सकता है, इसी दृष्टि को चरित्र भी कह सकते हैं और यही दृष्टि आगे जाकर संस्कार बन जाती है। तो केवल पढ़े-लिखे होने से काम नहीं चलेगा।

 

सच तो यह है कि एक दृष्टि चाहिए जो पढ़े-लिखे का मतलब भी अच्छे से समझा सके। दो वक्त की रोटी तो एक अनपढ़ मजदूर भी कमा लेता है। कुल-मिलाकर शिक्षा के पीछे समझ का बड़ा महत्व है। इसलिए ईश्वर से प्रार्थना करें कि हमारा नेतृत्व पढ़ा-लिखा तो हो, पर समझदार और संस्कारवान भी हो..।

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