जीने की राह / मौन में है योग का असली आनंद



jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata
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jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jun 20, 2019, 09:30 PM IST

अपने देश में जितने दिवस उतने आयोजन, जितने आयोजन उतने प्रदर्शन, जितना प्रदर्शन उतना पाखंड। जब पाखंड बढ़ता है तो दिवस अपना उद्देश्य खो बैठता है। आज योग दिवस है। बाढ़ आ जाएगी योग की। समझकर करने वाले, देखा-देखी करने वाले और तमाशा करने वाले, तीनों सक्रिय रहेंगे। योग के जितने मतलब हैं, एक संबंध उसका मौन से है।

 

इस वर्ष हमें योग दिवस को मौन से जोड़ना चाहिए। इसलिए कि अभी हमारे देश ने बहुत बोला, बहुत सुना। चुनावी शोर के दौरान हर एक की जुबान फिसलती गई। कान फट गए सुन-सुनकर। कितना अच्छा हो कि इस बार योग दिवस पर राजनेता और प्रजा दोनों तय करें कि इस दिन मौन रखेंगे। ध्यान रखिए, मौन और चुप्पी में फर्क है। बाहर से बोलना बंद कर दें तो चुप्पी और भीतर मन से भी बात नहीं करें तो मौन। मन कब मौन में गिरता है? जब उसको विचारों के मामले में नियंत्रित कर लिया जाए। विचार और मन का गहरा संबंध है।

 

मन में दो तरह के विचार आते हैं- अपने विचार और पराए विचार। अपने विचार तो होना भी चाहिए, पर हमारा पूरा जीवन और मन दूसरों के विचारों से संचालित होता है। मौन में दूसरों के विचार बाहर फिंकने लगते हैं, अपने विचार जमने लगते हैं और मौन घट जाता है। योग का यह अहम भाग है। तो क्यों न इस बार योग दिवस पर मौन रखा जाए। केवल दूसरों से बोलना ही बंद न करें, इस दिन स्वयं से भी बात बंद कर दें। फिर देखिए योग का असली आनंद क्या होता है...।

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