जीने की राह / भजन से अपनी प्राणशक्ति में शुभ शब्द जोड़ें



jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata
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jeene ki raah by pandit vijay shnakar mehata

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jul 02, 2019, 06:54 AM IST

अच्छी बात किसी के भी मुंह से सुनने को मिल जाए तो उसे तुरंत सुनें, गुनें और जीवन में उतारें। तुलसीदासजी ने अपने साहित्य में दुष्ट पात्रों के मुंह से भी बड़ी काम की बात कहलाई है। हनुमानजी जब संजीवनी लेने जा रहे थे तो रावण ने कालनेमि राक्षस से कहा, ‘इस वानर का मार्ग रोको’। कालनेमि रावण को समझाते हुए जो कहता है, उस पर तुलसीदासजी लिखते हैं, ‘भजि रघुपति करु हित आपना। छांड़हु नाथ मृषा जल्पना।।

 

अर्थात झूठी बकवास छोड़ राम का भजन करके तुम अपना कल्याण करो।’ देखिए, एक राक्षस भी कह रहा है, ‘भजन करो’। हम लोगों को कुछ समय भजन जरूर करना चाहिए। भजन के दो अंश होते हैं, पहला ‘भजन’ यानी शब्दों को किसी की स्मृति से जोड़कर उच्चारित करना। दूसरा होता है ‘भंजन’। भजन के शब्द हमारी वासनाओं का भंजन करते हैं, उन्हें खत्म करते हैं।

 

जब भजन करते हैं तो शब्द हमारी सांस से जुड़ते हैं और इससे प्राणवायु शुद्ध होती है। प्राण को शुद्ध करने में शब्द यदि काम आ जाएं तो यह बड़ा आसान तरीका है। हमने मनुष्य के रूप में जन्म लिया है तो हमें सुविधा है कि भजन के माध्यम से अपनी सांस से कुछ शुभ शब्द जोड़ सकें। पशुओं को यह सुविधा नहीं है।

 

 

इसलिए हर मनुष्य को अपने जन्मदिवस पर इसका लेखा-जोखा जरूर रखना चाहिए कि इस वर्ष कितने शब्दों को अपने प्राण से जोड़ा। इसका आसान तरीका है भजन। यही बात कालनेमि रावण को समझा रहा था। यदि ठीक से शब्दों को नहीं जोड़ा तो बाकी बातें बकवास-सी हो जाएंगी..।    
 

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