अपने भीतर की खूबियां न भूलें महिलाएं

3 वर्ष पहले
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दुनिया में बहुत कम लोग हैं जिन्होंने स्त्री-पुरुष अलग-अलग होने का मतलब अपनी जीवनशैली से समझाया हो। बेशक शरीर से कोई पुरुष है, कोई स्त्री है। पूरी जिंदगी बीत जाती है। आखरी सांस तक न तो पुरुष समझ पाता है कि मैं पुरुष क्यों हूं, मेरे भीतर पुरुष होने की क्या खूबियां हैं। ऐसा ही स्त्री के साथ भी होता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने जीते-जी स्त्री और पुरुष देह के मतलब समझाए हैं।

 

रामकृष्ण परमहंस ऐसे ही व्यक्ति थे। उन्हें परमहंस कहा ही इसलिए गया कि उन्होंने स्त्री और पुरुष देह का सही अर्थ संसार को बताया। आज जब दुनिया महिला दिवस मना रही है तो यह भी जानना पड़ेगा कि प्रकृति ने यदि किसी को स्त्री बनाया है तो उसके पीछे क्या कारण रहा होगा? पुरुष प्रधान समाज में स्त्री के साथ कई विडंबनाए हैं, संघर्ष है। किंतु इसमें उलझकर यदि वह अपने भीतर की खूबियां भूल जाए, तो जिंदगीभर पुरुष से संघर्ष ही करती रहेगी।

 

दांपत्य की परिपूर्णता क्या हो सकती है, यह रामकृष्ण परमहंस और शारदादेवी ने समझाया था। एक समय बाद यदि स्त्री-पुरुष और खास तौर पर पति-पत्नी का रिश्ता देह के ऊपर उठ जाए तो पति, पत्नी में देवी देखने लगता है और पत्नी पति को पुत्र की तरह मानने लगती है। उसका मातृत्व अलग ढंग से जाग जाता है। बात सुनने में अजीब लगती है लेकिन, यदि रामकृष्ण परमहंस को ठीक से पढ़-समझ लिया जाए तो जिंदगी देह से ऊपर उठकर आत्मा तक पहुंचकर सही ढंग से जानी जा सकती है।