जीने की राह / दिल में उतरती है संतुलित शब्दों में कही बात



jeene ki raah column on Decent way of conversation
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jeene ki raah column on Decent way of conversation

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jun 24, 2019, 09:45 PM IST

कोई महत्वपूर्ण कार्य या अभियान पूरा करना हो तो उसके पक्ष में वातावरण बनाएं और यदि बोलने का अवसर मिल जाए तो इतने संतुलित व प्रभावपूर्ण शब्दों में बात रखें कि जब कार्य पूर्ण हो तो लोग उन शब्दों को याद रखें। बोला हुआ और किया हुआ यदि सही ढंग से प्रस्तुत हो जाए तो शत्रु भी आपका यशज्ञान करेंगे। हनुमानजी के साथ ऐसा ही हुआ था।

 

लंका जलाने से पहले भरी सभा में रावण को बहुत अच्छे से समझाया था। वक्ता बहुत अच्छे थे हनुमानजी। रावण भी कम विद्वान नहीं था, लेकिन हनुमानजी ने अपनी वाक्कला से पूरी सभा को प्रभावित किया था। अपनी बात संक्षेप में पूरी शिष्टता के साथ संदेश के भाव से कह देने में हनुमानजी बेजोड़ थे। उसके बाद लंका कांड में जब लक्ष्मणजी मूर्छित हुए और हनुमानजी औषधि लेने चले तो किसी ने रावण को सूचना दी।

 

रावण कालनेमि नामक राक्षस के पास गया कि किसी प्रकार हनुमान का मार्ग रोके। रावण और कालनेमि में जो बात हुई उस पर तुलसीदासजी ने लिखा है, ‘दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरू धुना।। देखत तुम्हहि नगरू जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा।।

 

रावण ने सारा हाल बताया, कालनेमि ने सुना और बार-बार सिर पीटते हुए बोला- तुम्हारे देखते-देखते जिसने पूरा नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है? यह हनुमानजी की ख्याति थी, जो एक राक्षस बयां कर रहा था। हनुमानजी से सीखें, ऐसे काम करें कि उस सद्कार्य के पक्ष में हमारे शब्द भी लोगों को सदैव याद रह जाएं..।

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