जीने की राह / ‘मेरा-तेरा’ के अज्ञान की नींद से जागना होगा



jeene ki raah column on Mine-yours Feeling
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पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jul 08, 2019, 10:28 PM IST

‘मेरा-तेरा’ यह खेल बड़ा पुराना है। यह मेरा है, इस पर मेरा ही अधिकार है, मैं यह किसी को नहीं दूंगा..। यह सब तेरा है, तू मुझमें हस्तक्षेप न कर..। इस तरह की झंझटें जब इन्सान की ज़िंदगी में आती हैं तो वह कभी शांत नहीं रह सकता। जब ज्यादा मेरा-मेरा करते हैं तो उसमें ममता जाग जाती है। ममता एक प्रकार की मूढ़ता है, बेवकूफी है और जब इसकी समझ चली जाती है कि क्या मेरा, क्या तेरा तो यह अज्ञान एक अंधकार बन जाता है।

 

अंधकार यानी रात्रि। हर रात के बाद एक दिन प्रकाश होना चाहिए। दुनिया में कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसके जीवन में अज्ञानरूपी अंधकार नहीं है। मेरे-तेरे का यह खेल सबके बीच चलता है, लेकिन समय रहते इस अंधकार से बाहर आ जाना चाहिए। रावण को कालनेमि ने कहा- ‘मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू।। मतलब मैं-ते का भेदभाव, ममतारूपी मूढ़ता को छोड़ दो। मोहरूपी अज्ञान की रात्रि में सो रहे हो, इससे जाग उठो..।

 

यह ‘जाग उठो’ शब्द जो कालनेमि ने रावण को कहा, हमारे लिए बड़े काम का है। हम सब भी इसी अंधकार में सोये पड़े हैं। बाहर की दुनिया में तो मेरा-तेरा फिर भी समझ में आता है, लेकिन अब तो लोग अपने ही घर-परिवार में भी मेरा-तेरा करने लगे हैं और इसीलिए परिवारों में कलह उतर रहा है। कम से कम परिवार में रहते हुए तो अज्ञान की इस निद्रा से हमें जाग जाना चाहिए। जागे हुए लोगों के परिवार कभी नहीं टूटेंगे। एक राक्षस हम मनुष्यों के लिए बड़े काम की बात कर गया..।

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