जीने की राह / दिव्य परंपरा छोड़ गए हैं सत्यमित्रानंद



jeene ki raah column on satyamitranand
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पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jun 26, 2019, 05:11 AM IST

समाज और साधु, इन दोनों का कितना तालमेल है, कितना मतभेद है, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है। फिर आज के समय में तो साधुता जितना सम्मान पा सकती है, उतना ही उसका अपमान भी हो रहा है। समाज पूछता है- साधु लेता तो हमसे है, हमें क्या देता है? एक संन्यासी क्या कर सकता है, इस पर इतिहास के कई पृष्ठ रंगे हुए हैं। किंतु एक संन्यासी क्या-क्या कर सकता है, इसकी बात जब भी चलेगी, स्वामी सत्यमित्रानंद गिरिजी याद किए जाएंगे।

 

उनका समूचा जीवन समाज की उन सारी गतिविधियों को समर्पित था, जो किसी भी संन्यासी के लिए नए मापदंड हैं। ईश्वर सेवा को उन्होंने नया रूप दिया था। जाना तो सभी को है, कोई नहीं बचेगा, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि जाने के बाद पीछे क्या छूटता है? स्वामीजी ने अपने पीछे एक पूरी दिव्य परंपरा छोड़ी है। जब भी समाज और राष्ट्र यह जानना चाहेगा, मानवता के मन में यह प्रश्न उठेगा कि कोई संन्यासी क्या दे सकता है, तो सदैव सत्यमित्रानंदजी याद किए जाएंगे।

 

उनका दूरदर्शी होना ही उनका त्रिकालदर्शी होना है। समय रहते उन्होंने अपनी दिव्य परंपरा, जिनके हाथों में दी, वे समाज और साधु के रिश्तों की नई परिभाषा तय कर रहे हैं। छत्र भले ही अदृश्य हो गया हो, पर छाया रह गई अवधेशानंद गिरिजी के रूप में। समाज को हमेशा ऐसे लोगों की छत्रछाया चाहिए, जिन्होंने आवरण और आचरण दोनों से संन्यास को ऊंचाइयां दीं। समाज अपने आपको इनकी छत्रछाया में सुरक्षित महसूस कर सकता है..।

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