जीने की राह / यदि विवेक है तो गुरु की पहचान संभव

jeene ki raah: Identification of Guru from Discretion
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jeene ki raah: Identification of Guru from Discretion

Jul 15, 2019, 09:48 PM IST

‘किसे गुरु बनाएं? इस दौर में जितने प्रश्न मनुष्य जीवन में उछल रहे हैं, एक यह सवाल भी ऐसा खड़ा हो गया है, जिसमें साधक लोग चिंतित भी हैं, भ्रमित भी। जिन्हें ईश्वर में विश्वास है, रुचि है, वे ही लोग गुरु भी ढूंढ़ते हैं। चूंकि जीवन के हर हिस्से में अवमूल्यन हुआ है, धर्म का क्षेत्र भी नहीं बचा। इसलिए गुरु नाम की संस्था भी संदेह के घेरे में आ गई।

 

वैसे यह बात अच्छी नहीं है, पर घट चुकी है। लंका कांड के एक दृश्य में हनुमानजी लक्ष्मणजी के लिए संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे और रावण की आज्ञा पर कालनेमि ने वेश बनाया हनुमानजी को रोकने के लिए। साधु बनकर हनुमानजी से बात की तो उन्हें लगा व्यक्ति साधु है, तो इससे पानी मांगा जाए। हनुमानजी को विश्वास हो गया तो कालनेमि ने कहा, ‘सर मज्जन करि आतुर आवहु। दिच्छा देउॅ ग्यान जेहि पावहु।।’

 

अर्थात तुम सरोवर में स्नाान कर तुरंत लौट आओ, मैं दीक्षा दूंगा जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो। एक गुरु क्या करता है? दीक्षा देता है, लेकिन हनुमानजी को मछली ने बता दिया कि यह साधु नहीं, साधु के वेश मेें राक्षस है। तो हनुमानजी स्नान कर लौटे और कहा- ‘कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू। पाछें हमहिं मंत्र तुम देहू।।’ पहले आप गुरु दक्षिणा ले लीजिए, उसके बाद मंत्र दीजिएगा।

 

ऐसा कहते हुए हनुमानजी ने कालनेमि की पिटाई कर दी। कुल मिलाकर यह घटना बताती है कि यदि आपके पास विवेक है, अपना तप है, निज साधना है तो गुरु की पहचान कर लेंगे। वरना यदि तैयारी ठगाने की है तो फिर गुरु नाम की संस्था को क्या दोष देना..?

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