मैनेजमेंट फंडा / बस तय करें, फिर देखें आप कितना कुछ दे सकते हैं!

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 11:37 PM IST



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  • मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 

बहुत से लोग जब परोपकारी लोगों की कहानियां पढ़ते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके पास ऐसे लोगों की तरह देने के लिए ज्यादा संसाधन नहीं है। लेकिन, विश्वास कीजिए कुछ लोग इस सोच से उलटा करते हैं क्योंकि वे अलग तरह से सोचते हैं। ऐसे ही तीन प्रेरक उदाहरण पेश हैं।


 

पहली कहानी : कौन कहता है कि उत्तरायण के दिन सिर्फ पतंगें उड़ाई जाती हैं? अहमदाबाद के चिंतन शाह की सोच कुछ अलग है। वे अपनी शादी से पहले आने वाली 20 जनवरी को एक प्री-वेडिंग पार्टी दे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने डीजे भी बुक किया है और मॉकटेल भी परोसे जाएंगे। और, हैरान होने की जरूरत नहीं क्योंकि पूरे आयोजन की थीम ‘उत्तरायण’ ही रखी गई है!  इसके लिए चुनी गई जगह भी थीम के साथ मेल खाती है, क्योंकि यह उनकी सोसायटी की छत है। अग्रवाल टॉवर्स में जहां वे रहते हैं वहां दो छत हैं। एक छत पर युवाओं के लिए इंतजाम किए गए हैं और दूसरी पर वरिष्ठों के लिए। उत्तरायण के दिन ऐसी पार्टी रखने के पीछे क्या आइडिया है? चिंतन का मानना है कि इस पार्टी के बहाने वे कई लोगों को व्यस्त कर पांएगे ताकि वे लोग उस दिन पतंग न उड़ाएं और इस वजह से परिंदे घायल होने से बचेंगे। इस तरह एक थीम और छत वाली पार्टी के जरिये वे दुनिया में कुछ बचाने के काम में योगदान देने वाले हैं। ये बड़ा सहज लेकिन, नेक विचार है। 


दूसरी कहानी : पुणे जिले में सोलापुर हाईवे पर बसे एक गांव सोरतापवाड़ी में इस रविवार महल की तरह सजा बड़ा-सा मंच पंडाल के साथ तैयार था। पंडाल के आसपास कुर्सियां लगाई गई थीं और दुल्हन भी जीवन के इस खास दिन के लिए तैयार हो रही थी। लेकिन, दूल्हा कहीं नज़र नहीं आ रहा था।


दूल्हा वहां से गायब होकर एक सामाजिक कार्य में हाथ बंटाने पहुंचा था जो उसके दिल के बेहद करीब है। यह कार्य है- अपने गांव सोरतापवाड़ी में स्वच्छता मुहिम चलाना। हर रविवार की सुबह पूरे गांव के लोग इकट्ठे होकर एक साथ करीब दो घंटे तक कचरा उठाते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि उनका गांव स्वच्छ बना रहे। इस दूल्हे का नाम है सुदर्शन चौधरी, जो गांव के सरपंच भी हैं। शादी रविवार के दिन थी लेकिन, सुदर्शन चाहते थे कि वे उस दिन भी अपना योगदान दें और लोगों के प्रति अपने समर्पण को पूरा करें।  बीते रविवार को ही इस मुहिम ने अपना 85वां हफ्ता पूरा किया है, चूंकि ये सरपंच की शादी का दिन था तो गांव वालों ने सोच लिया कि हमारा युवा नेता आज शायद ही सफाई के काम के लिए आए! इसके विपरीत चौधरी ने, न केवल मुहिम में भाग लेने का फैसला किया, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर हमेशा की तरह सुबह 6 बजे से अगले दो घंटे तक कचरा इकट्ठा किया और जब उस दिन की मुहिम की खत्म हो गई, तभी वे अपनी शादी के लिए रवाना हुए।


तीसरी कहानी : आपको और मुझे एक शर्ट पहनने, उसके बटन लगाने, उसे पैंट में अंदर डालने और ज़िप बंद करने तक के कामों के लिए तीन मिनट से कम समय लगता है, पर हमारे देश में करीब 2 करोड़ 68 लाख ऐसे दिव्यांग हैं, जिन्हें इन्हीं कामों के लिए हमारी तुलना में चार गुना समय लगता है। हमारे बीच ऐसे दिव्यांग हैं, जो रीढ़ की चोट से और लकवे से पीड़ित हैं। फिर भी वे अलग-अलग कंपनियों में काम करते हैं और पैरा ओलिम्पिक खेलों में हिस्सा भी लेते हैं। लेकिन उन्हें दैनिक कामों को करने में सामान्य से ज्यादा समय लगता है। इसी समस्या को पहचान कर अमेरिकी ब्रांड टॉमी हिलफिगर ने एक स्पेशल लाइन, टॉमी एडाप्टिव लॉन्च की है। इस रेंज के शर्ट में बटन की जगह वेलक्रो स्ट्रिप और पैंट में एक बड़ी रिंग के साथ ज़िपर लगी है ताकि उसे आसानी से ऊपर और नीचे किया जा सके। पैंट में इलास्टिक डाला गया है और साड़ी को नाइटी की तरह स्टिच किया गया है। मैं जानता हूं कि बहुत से लोगों के लिए यह एक आज़ादी और सम्मानजनक सुविधा होगी।

 

फंडा यह है कि    बिज़नेस हो या जश्न, यदि आप सोच का दायरा बढ़ाएंगे तो न केवल दुनिया को बहुत कुछ लौटाएंगे बल्कि आपका काम ‘ज़रा हटके’ लगेगा!
 

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