खुली बात / भारतीय राजनेता के आदर्श रूप अटलजी



khuli baat column by bjp leader prabhat jha
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khuli baat column by bjp leader prabhat jha

  • वैचारिक दृढ़ता दिखाने के साथ विरोधियों को भी अपना बनाने वाले अनूठे नेता

Dainik Bhaskar

Aug 14, 2019, 12:38 AM IST

वर्ष 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना की और तब से जुड़े लोगों में एक अग्रणी नाम था ‘अटल बिहारी वाजपेयी’। जब डॉ. मुखर्जी ने परमिट तोड़कर जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया तो बतौर पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी साथ गए थे। प्रवेश के बाद डॉ. मुखर्जी ने अटलजी से कहा ‘वाजपेयी गो बैक एंड टेल द पीपल ऑफ इंडिया डॉ. मुखर्जी एन्टर्ड जम्मू-कश्मीर विदाउट परमिट’। 23 जून 1953 को कश्मीर में नज़रबंद डॉ. मुखर्जी की रहस्यमयी मौत हो गई। अटलजी पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में तो प्रारम्भ में ही आ गए थे और उत्तर प्रदेश के संडीला में कुछ महीनों के लिए संघ के विस्तारक के रूप में गए थे लेकिन, भारतीय जनसंघ की यात्रा जो उन्होंने उस समय शुरू की वह फिर नहीं रुकी।


उनकी वाणी को सरस्वती का वरदान था, जो उनकी पहचान बन गई। कठोर से कठोर बातों को वे शीतल वाणी में कहकर लोगों का मन जीत लेते थे। यही वजह है कि 1963 में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सदन में उनका ओजस्वी भाषण सुनकर कहा था ‘मैं इस युवा में भारत का भविष्य देखता हूं’। भारतीय राजनीति में नेतृत्व की जो कल्पना की गई है, अटलजी उसके पर्याय थे। ‘राजनेता’ शब्द को हमारे वक्त में किसी ने जिया तो वे अटलजी ही थे।
कवि, लेखक, दार्शिनिक  अटलजी अत्यंत संवेदनशील थे पर विचारों के लिए अनूठी प्रतिबद्धता भी उनके व्यक्तित्व की खासियत थी। मसलन, आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के हित में उन्होंने भारतीय जनसंघ का विलय जनता पार्टी में कर दिया, लेकिन कुछ वर्षों बाद कुछ नेताओं ने जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता की बात उठा दी। यहां तक कह दिया कि जो जनसंघ के घटक के लोग पार्टी में हैं, उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदयता छोड़नी होगी।

 

अटलजी ने आरंभ में इसे हलके से ले लिया और कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कोई सदस्यता नहीं होती है पर वे नेता नहीं माने। अटलजी  ने कहा,  ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमारी मातृ संस्था है। हम वहां से संस्कारित हुए हैं। हम राजनीति छोड़ सकते हैं, जनता पार्टी छोड़ सकते हैं, पर कभी भी संघ छोड़ने की बात नहीं कर सकते।’  इसके बाद ही 6 अप्रैल 1980 को ‘भारतीय जनता पार्टी’ का जन्म हुआ। अटलजी पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने भाजपा के मुंबई में हुए प्रथम सम्मलेन में कहा था, ‘अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा’। इसी प्रकार जब ढांचा टूटा तो वे दुखी हो गए। पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अब आप क्या करेंगे। उन्होंने कहा, ‘ढांचा गिरना दुखद है पर मैं सदन में नरसिंह रावजी से यह अवश्य जानना चाहूंगा कि आखिर ये परिस्थिति क्यों बनी। क्या सरकार इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?’ उनकी आंखों के सामने पहले देश रहता था और दल बाद में आता था। इसीलिए वे  प्रतिपक्ष के पहले नेता थे, जिन्हें भारत सरकार ने शिष्टमंडल लेकर संयुक्त राष्ट्र भेजा था। वे दल के माध्यम से देश की राजनीति करते थे।


अटलजी के जीवन का हर राजनैतिक प्रसंग हम भारतीयों काे प्रेरणा देता है। वे जब स्वयं चुनाव हार गए और भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली तब वे विचलित नहीं हुए। उन्होंने कहा था, ‘हम चुनाव हारे हैं, मन नहीं हारे’। वे पराजय में जय की संभावनाओं को कभी छोड़ते नहीं थे, वे कहते थे कि ‘आज की पराजय ही कल की जय की संभावना लेकर आएगी’।  विपक्ष की राजनीति करते हुए वे कभी तनाव में नहीं दिखे, क्योंकि वे ‘मैं’ से दूर और ‘हम’ के करीब रहते थे। भारतीय राजनीति में वर्षों विपक्ष में रहते हुए वे जिस तरह देशवासियों की श्रद्धा व चिंतन के केंद्र रहे वैसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ। अजातशत्रु शब्द को उन्होंने प्यार से जिया। उनका कोई दुश्मन नहीं था। वे अपने दल में जितने लोकप्रिय थे, उससे भी अधिक अन्य, खासकर विरोधी दलों में लोकप्रिय थे। विरोधी दलों के नेता यह कहते हुए सुने जाते थे कि काश हमारी पार्टी में कोई अटलजी होते। वे सदैव विपक्ष में रहे पर देश का हर नागरिक यह कहता था कि अटलजी को एक न एक दिन प्रधानमंत्री बनना चाहिए। 16 अगस्त 2018 को अटलजी काया से हमें छोड़कर गए, पर उनकी वैचारिक छाया के आंचल में हम सदैव पल्लवित होते रहेंगे। (प्रभात झा, राज्यसभा सांसद व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष)

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