खुली बात / नई टेक्नोलॉजी से रफ्तार की पटरी पर हमारी ट्रेन



khuli baat column on new technology of indian railways
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khuli baat column on new technology of indian railways

  • जल्द ही स्वदेश में निर्मित होगी तीन सौ से ज्यादा की रफ्तार वाली ट्रेनों की टेक्नोलॉजी 

Dainik Bhaskar

Sep 12, 2019, 12:57 AM IST

रेलवे को परिवहन के क्षेत्र में सबसे कार्यक्षम माध्यम माना जाता है। सड़क परिवहन में लगने वाले ईंधन के सिर्फ छठे हिस्से से इसका काम चल जाता है। रेल परिवहन को सौ फीसदी बिजली से चलाने के फैसले के बाद टेक्नोलॉजी के स्तर पर भारतीय रेलवे में तरक्की के कई पड़ा दिख रहे हैं। पहली चुनौती मौजूदा रेल कॉरिडोर पर बुनियादी ढांचे में न्यूनतम रद्दोबदल के साथ औसत रफ्तार बढ़ाने की थी। इसका हल ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी में था। पूरी दुनिया में सेमी हाई स्पीड और हाई स्पीड ट्रेनों के लिए दो टेक्नोलॉजी उपलब्ध हैं। एक ट्रेन सेट और दूसरी पुल-पुश टेक्नोलॉजी। पहले ट्रेन सेट टेक्नोलॉजी की बात। वर्ष 2000 के बाद विभिन्न रेल बजटों में नियमित रूप से इसे अपनाने की घोषणा होती रही। पिछले साल इसे अपनाया गया और वंदे भारत एक्सप्रेस इसका पहला साकार रूप है।

 

हाई स्पीड वाली ट्रेनें पुरानी ट्रेनों के परम्परागत तरीके से नहीं चलतीं। उनमें एक या दो कोच ऐसे होते हैं, जिनमें सारी ट्रैक्शन मोटर्स होती हैं। लेकिन, आधुनिक हाई स्पीड ट्रेन में ट्रैक्शन मोटर लगभग हर कोच में होती है ताकि बेहतर रफ्तार पाई जा सके। ट्रेन सेट में सारे यात्री कोच शामिल होते हैं, जिसमें एक ड्राइविंग कार होती है। कहा जा रहा है कि यह पहली ट्रेन है, जिसमें इंजन नहीं है पर आम आदमी के लिए तो यह वही ट्रेन है जो सारी मेट्रो ट्रेन और उपनगरीय ईएमयू ट्रेन सिस्टम में इस्तेमाल हो रही है। नया यह है कि इस टेक्नोलॉजी का सेमी हाई स्पीड और हाई स्पीड ट्रेनों तक विस्तार हो रहा है।


अब पुल पुश की बात। हमने कई पहाड़ी रेलवे ट्रैक पर ट्रेन के आगे और सबसे आखिरी में, दोनों तरफ इंजन लगे देखे हैं। मोटेतौर पर इस टेक्नोलॉजी की भी वही खासियत है। फ्रांस के ख्यात टीजीवी सिस्टम, यूरो स्टार, अमेरिका की एसेला ट्रेन और पश्चिम की कई रेल प्रणालियों में यह प्रचलित है। इसका पहला ट्रायल पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन से मुंबई के बांद्रा टर्मिनल तक चलाकर किया गया था। तब पाया गया था कि इस टेक्नोलॉजी से इन दोनों स्टेशनों के बीच सफर में 83 मिनट कम लगते हैं।  इस साल 13 फरवरी को मुंबई के सीएसटी से हजरत निजामुद्दीन तक चलने वाली सीआर राजधानी ट्रेन क्रमांक 22221 में इसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। इसमें सफर का 95 मिनट घट गया। अब भारतीय रेलवे दोनों टेक्नोलॉजी होने का गर्व से दावा कर सकती है।


यह तो जाहिर है कि पुल पुश सिस्टम का मुख्य उद्देश्य ट्रेन को अधिक एक्सीलरेशन देना है, लेकिन इसके साथ इसमें ब्रेक भी तेजी से लगता है। इससे पश्चिमी घाट में सुरक्षा बढ़ी है, जिसमें कई तीखे मोड़ और चढ़ाव है, जिसके लिए पीछे से धक्का लगाने के लिए इंजन लगता था। आगे और पीछे के इंजन में तालमेल न जमने से कई बार रेल पटरी से उतर जाती थी। पुराने सिस्टम में कसारा या करजत के घाट में पीछे इंजन जोड़ने के बाद यह क्रमश: इगतपुरी या लोनावला में हटाया जाता था, जिसमें वक्त लगता था। अब ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं। पुल पुश में रफ्तार तेजी से बढ़ती है तो तेजी से कम भी की जा सकती है। इससे रेलवे ट्रैक पर गति के विभिन्न प्रतिबंधों के अनुसार बदलाव करने में वक्त जाया नहीं होता। दोनों छोर पर मौजूद लोकोमोटिव के एक साथ नाकाम होने की संभावना न के बराबर है, इसलिए किसी सेक्शन के ब्लॉक होने की गुंजाइश भी घट जाती है। इसमें यात्रियों को आम ट्रेनों की तरह झटके महसूस नहीं होते।


मौजूदा ट्रैक पर अधिकतम गति बढ़कर 225 किलोमीटर प्रति घंटा तक बढ़ाई जानी है। इसके लिए लोकोमोटिव और कोच दोनों को उसके मुताबिक रखना होगा। मौजूदा लोकोमोटिव को तो इसके अनुरूप बदला जा सकता है पर कोच के लिए एल्यूमिनियम एलॉय बॉडी का विकल्प है, क्योंकि 200 की रफ्तार के आगे ईंधन की खपत बहुत बढ़ जाती है और एल्यूमिनियम बॉडी रोलिंग स्टॉक से ईंधन की काफी बचत हो जाएगी। यह पुल पुश और वंदे भारत जैसी ट्रेनों, दोनों के लिए सही है। पुल पुश टेक्नोलॉजी की मौजूदा शुरुआत के साथ हमारा देश 225 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली पुश पुश टेक्नोलॉजी स्वदेश में ही विकसित करने की दहलीज पर है और फिर यह सफलतापूर्वक 320 किमी प्रति घंटे की रफ्तार की टेक्नोलॉजी भी उसी सहजता से विकसित कर अपना सकेगा। इसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी के साथ रेल मंत्री पीयूष गोयल को है।

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