--Advertisement--

अमेरिकन डिप्लोमेसी / चीन से टकराव की राह पर है अमेरिकी नीति- ललित झा



ललित झा चीफ कॉरेसपॉन्डेन्ट पीटीआई, वाशिंगटन ललित झा चीफ कॉरेसपॉन्डेन्ट पीटीआई, वाशिंगटन
X
ललित झा चीफ कॉरेसपॉन्डेन्ट पीटीआई, वाशिंगटनललित झा चीफ कॉरेसपॉन्डेन्ट पीटीआई, वाशिंगटन

  • संदर्भ- ट्रम्प प्रशासन अपनी नई नीति में अमेरिकी हितों के लिए चीन को मानता है रूस से बड़ा खतरा 

Dainik Bhaskar

Oct 12, 2018, 11:56 PM IST

अमेरिका के तब के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की ऐतिहासिक यात्रा करके उसे ‘दुनिया को बदलने वाला हफ्ता’ बताया था। उसके 46 साल बाद मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चार दशक से पुरानी चीन नीति को उलटने की ओर आक्रमक ढंग से बढ़ रहे हैं। अपने 2016 के चुनाव अभियान और 20 जनवरी 2017 को अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प का फोकस अमेरिका-चीन संबंधों के वाणिज्यिक पहलुओं पर रहा है। पहले दिन से ही ट्रम्प ने इरादे साफ कर दिए कि वे चीन को व्यापार घाटे के साथ बच निकलने नहीं देंगे, जो उनके मुताबिक 500 अरब डॉलर सालाना है। उन्होंने चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों की समीक्षा का आदेश भी दे दिया।

 

जब समीक्षा चल  रही थी तो ट्रम्प ने चीन की तरफ हाथ बढ़ाया, जिसका उद्‌दे्श्य फ्लोरिडा के अपनी मार-ए-लागो स्थित एस्टेट पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात में अच्छे रिश्ते स्थापित करने का था। बाद में वे खुद चीन यात्रा पर गए, जिसे उन्होंने ऐतिहासिक बताया और कहा कि उन्होंने शी के साथ अच्छे रिश्ते स्थापित कर लिए हैं। लेकिन, चीन व्यापार घाटा कम करने का उनका अनुरोध स्वीकार करने को तैयार नहीं था तो इस साल के प्रारंभ में ट्रम्प ने चीनी उत्पादों के आयात पर शुल्क लगाने की घोषणा की। शुरुआत स्टील और एल्यूमिनियम से हुई, जिससे भारत, जापान, दक्षिण कोरिया सहित कई देश और यूरोपीय संघ को भी चोट पहुंची। हालांकि, बाद में लगाए शुल्कों का मुख्य लक्ष्य सिर्फ चीन था। छह माह से भी कम समय में ट्रम्प प्रशासन ने 250 अरब डॉलर से ज्यादा के चीनी उत्पादों के आयात पर अतिरिक्त शुल्क थोप दिए। चीन की जवाबी कार्रवाई ने ट्रम्प का संकल्प और मजबूत किया। उन्होंने और शुल्क लगा दिए, जिससे कुछ विशेषज्ञ इसे व्यापार युद्ध का नाम देने लगे।

 

लेकिन, ट्रम्प की चीन नीति सिर्फ व्यापार और वाणिज्य पर केंद्रित नहीं दिखाई देती। पिछले माह न्यूयॉर्क में ईरान व परमाणु अप्रसार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता करते हुए ट्रम्प ने यह आरोप लगाकर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में मौजूद सभी को चौंका दिया कि चीन अमेरिका के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है। 26 सितंबर को उन्होंने सुरक्षा परिषद के सदस्यों को बताया, ‘वे नहीं चाहते हैं कि मैं या हम जीतें क्योंकि मैं व्यापार पर चीन को चुनौती देने वाला पहला राष्ट्रपति हूं।’

 

एक हफ्ते बाद 4 अक्टूबर को उनके उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने रिपब्लिकन झुकाव रखने वाले वाशिंगटन स्थित शीर्ष अमेरिकी थिंक-टैंक हडसन इंस्टीट्यूट में भाषण दिया, जिसे उनके प्रशासन ने नई चीन नीति बताया। भाषण के कड़े स्वर ने कई लोगों को चौंकाया। पेंस ने चीन पर  राजनीतिक, आर्थिक, सैन्य उपायों और झूठे प्रचार के पूरी तरह सरकारी प्रयासों से अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने और हित साधने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चीन की नई आक्रामकता तब दिखाई दी जब उनका नौसैनिक पोत यूएसएस डिकाटुर के तब अत्यंत निकट आ गया, जब यह दक्षिण चीन सागर में फ्रीडम-ऑफ-नेवीगेशन ऑपरेशन अंजाम दे रहा था। पेंस ने चीन पर अमेरिकी अखबारों में लेखनुमा विज्ञापन देकर घरेलू राजनीति और 2018 के मध्यावधि चुनाव को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करने का आरोप लगाया। इन आरोपों का चीन ने खंडन किया है।  इसके तुरंत बाद ट्रम्प के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि अन्य देश लॉबिइस्ट और इस तरह की चीजों का सहारा नहीं लेते। लेकिन, मैंने चीन जैसी गतिविधियों की व्यापकता नहीं देखी।’ ट्रम्प की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति के मुताबिक चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धी है और शिकारी अर्थशास्त्र से यह अपने पड़ोसियों को धमकाता है और दक्षिण चीन सागर का सैन्यीकरण कर रहा है। 

 

यह संकेत है कि अमेरिका-चीन के बीच सबकुछ ठीक नहीं है। अमेरिकी रक्षा मंत्री जैम्स मैटिस ने चीन की यात्रा रद्‌द कर दी। विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ जरूर दक्षिण कोरिया, जापान व उत्तर कोरिया सहित चार देशों की यात्रा के तहत चीन गए। नेशनल पब्लिक रेडियो और अन्य मीडिया ने कहा कि यह यात्रा इतनी अच्छी नहीं रही। ट्रम्प ने कहा कि पोम्पियो के साथ ऐसा व्यवहार करके वे मुझे संदेश दे रहे हैं लेकिन, ‘यह संदेश काम नहीं आएगा।’ इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में न्याय विभाग ने अमेरिका में मौजूद चाइना ग्लोबल टेलीविजन नेटवर्क को विदेशी एजेंट के रूप में रजिस्ट्रेशन कराने को कहा है। ट्रम्प प्रशासन ने और भी कई कदम उठाए हैं, जिनसे रिश्ते टकराव की ओर बढ़ने का संकेत मिलता है।

 

इसके साथ अमेरिकी कांग्रेस में भी चीन विरोधी माहौल बन रहा है। प्रतिनिधि सभा ने एक प्रावधान लाया है कि यदि चीन अमेरिकी राजनयिकों व पत्रकारों को अपने यहां घूमने की  वही आजादी नहीं देता जैसी चीन के राजनयिक व पत्रकारों को अमेरिका में है तो उन पर भी यहां पाबंदियां लगाई जाएंगी। इसी तरह का प्रावधान सीनेट में भी पारित किया जा रहा है, जिसके बाद यह व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति ट्रम्प के हस्ताक्षर के लिए जाएगा और कानून बन जाएगा। चीनी नीति को उलटने का पहला संकेत पिछले साल ट्रम्प प्रशासन की पहली राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में मिला था। इसमें कहा गया कि चार दशकों तक अमेरिकी नीति इस भरोसे पर आधारित थी कि चीन के उभार और महायुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से इसे जोड़ने को समर्थन देने से चीन में उदारीकरण आएगा। लेकिन, इसके विपरीत चीन ने दूसरों की सम्प्रभुता की कीमत पर अपनी शक्ति का विस्तार किया है। 


वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि आगामी हफ्तों में चीनी नीति में और बदलाव आएंगे और कुछ गोपनीय दस्तावेज भी सार्वजनिक किए जाएंगे, जो अमेरिका में चीनी गतिविधियों और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को पैदा खतरे के प्रति जागरूकता फैलाने के लक्ष्य का हिस्सा है। अब ट्रम्प प्रशासन का पक्का मानना है कि रूस नहीं चीन अमेरिका के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है।  ट्रम्प के सुरक्षा परिषद में चुनाव में दखल देने का आरोप लगाने के एक हफ्ते  पहले ही पोम्पिओ ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू मे कहा था, ‘व्लादिमीर पुतिन के तहत रूस दादागिरी दिखाता है। उन्हें हमें जहां संभव हो रोकना होगा। लेकिन, दीर्घावधि में जहां तक अमेरिकी आजीविका और अमेरिका की आर्थिक वृद्धि के लिए जोखिम की बात है, चीन अमेरिका के लिए कहीं बड़ा खतरा है।’

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..