सुर्खियों से आगे / कानून कहता है न्याय हुआ, मन कहता है, इतनी देर से कैसा न्याय?

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

शिव दुबे

शिव दुबे

Jan 15, 2020, 12:05 AM IST

निर्भया के दरिंदों का आखिरकार फांसी के फंदे तक पहुंचना तय हो गया है। कानून की भाषा में हम कह सकते हैं कि न्याय मिला। पर मेरे जैसे हजारों-लाखों लोगों का मन सवाल कर रहा है कि दरिंदों को सजा ए मौत सुनाने में आखिर इतनी देर क्यों?


देश का कानून जरूर कहता है कि किसी बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब आरोपियों ने ही जुर्म कबूल लिया तो फिर किस बात की जिरह? पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम ई. ग्लैडस्टोन का एक चर्चित वाक्य है- जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड।  


जरा गौर कीजिए। हैदराबाद में आरोपियों के एनकाउंटर के बाद देश में किस तरह से  पुलिस की वाहवाही हुई। कहीं उन पुलिस वालों पर फूलों की बारिश तो कहीं उनके लिए मन से दुआ। भावनाओं का उबाल था। निर्भया और हैदराबाद के मामले में न्याय के अंतर को समझने की जरूरत है।

कह सकते हैं कि किसी भी हालत में पुलिस को कानून हाथ में लेने की आजादी नहीं दी जा सकती। पर याद करिए, जब हैदराबाद के आरोपियों को पुलिस बस से लेकर जा रही थी, तब लोगों ने किस तरह पत्थर बरसाए थे। गुस्से का उफान था। जरा हमारे आसपास के देशाें के न्याय पर गौर करें।


चीन-मेडिकल जांच के बाद दुष्कर्मी को मौत की सजा।
उत्तर कोरिया-सिर में सरेआम गोली मार दी जाती है।
संयुक्त अरब -एक हफ्ते के अंदर फांसी।
पोलैंड –आरोपी को नपुंसक बना दिया जाता है।
इराक-पत्थर से संगसार (मौत की सार्वजनिक सजा)।


यह नहीं कहा जा सकता कि इन देशों के कानून को यहां जस का तस अपना लिया जाए। करीब दो महीने पहले दुबई में हम एयरपोर्ट से निकलकर बस में बैठे। तब ट्रैवल गाइड ने जो सबसे पहली लाइन हमें कही, वह थी कि आप दुबई में हैं जहां जीरो परसेंट क्राइम है। कारण बताया कि यहां न तो नेतागिरी है और न ही राजनीति के दांवपेंच। सिर्फ कानून का भय है।


यानी हमारे देश के बिल्कुल विपरीत। देशद्रोही कानून की धाराओं में गलियां ढूंढ़कर बच निकलते हैं। निर्भया के दुष्कर्मी सात साल तक पूरे देश को चिढ़ाते रहे। ना कानून का भय। ना ऐसे उदाहरण कि दरिंदों का हश्र कंपकंपी पैदा करने वाला। हमारी न्यायपालिका को तो काफी सोच समझकर ही इतना ठोस बनाया गया है कि हर किसी को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाता है।

भले ही वह सीरियल किलर हो या फिर सैकड़ों लोगों को मारने वाला आतंकवादी। उसको कानूनी मदद से लेकर उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलता है। ऐसे में निर्भया के आरोपियों को जब हमारी ही न्यायपालिका ने मौत की सजा सुना दी तो फिर उनको इतने विकल्प क्यों मिलने चाहिए। यही वजह है कि आज हर कोई इस बात से खफा है कि निर्भया केस में अपराधियों को अंजाम तक पहुंचाने में देर हुई है।


पर यह भी एक सच्चाई है कि हमारे देश में आक्रोश भी पानी के बुलबुले की तरह है। कोई घटना होती है और गुस्से का उबाल आता है। कानून बनाने की मांग उठती है। फिर राजनीति का कोई नया भूचाल आ जाता है। कभी 370 तो कभी नागरिकता। और हमारी ड्राइंग रूम की बहस भी बदल जाती है।

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